तेरे इंतज़ार के सफर में यादें मील का पत्थर बनती गयीं ना सफर मुकम्मल हुआ ना यादों का सिलसिला रूका। ------------------------------------ ये सफर कभी ख़त्म ही नहीं होता।
इस सर्द मौसम तेरी याद की भीनी भीनी खुशबू घुल रही है सांसों में नरम नरम धूप के अहसास सी समय की धार से मन के उस पार संघनित होती जाती धुंध सी उदासी आहिस्ता आहिस्ता उड़ती जाती भाप सी। ------------------------------------ यादों का मौसम से कोई रिश्ता तो नहीं
(गूगल से साभार)
उस जगह जहाँ हमने कभी गुनगुनाया था प्रेम और बोए थे कुछ सपने एक ज़िंदगी उगाने को अब वो जगह पड़ी हैं वीरान वीरा कुछ उदास उदास बह रहा है एक शोर धीमा धीमा सूखे पत्तों का मोजार्ट और बीथोहोवेन की उदास धुनों सा और मैं सुन हूँ बहका बहका सा। ------------------------------------ नितांत खालीपन वाले इस समय में
एक लड़की का सपना नदी सा होता है बहना चाहती है नदी सी इतराती इठलाती सी बेरोक टोक दुर्गम घाटियों से लेकर समतल मैदानों तक बिखेरती चलती है हरा रंग अपने आस पास और सोखती जाती है काला रंग वही सपना जब एक ग़रीब की आँखों में जन्मता है तो आग सा होता है और उस आग से ज़िंदगी के चारों ओर फैले घने कोहरे को उड़ा देना चाहता है भाप की तरह जला देना चाहता है सारे जुल्म ओ सितम एक अमीर का सपना होता है दूध दूह लेने वाली मशीन सा जिसमें न ममत्व का स्पर्श न भावनाएं न दिल न जिगर वो आदमी की जिंदगी को केवल दूहना और दूहना चाहता है दरअस्ल सपने बिलकुल पानी जैसे होते हैं जिनकी अपनी कोई शक्ल सूरत या आकार नहीं होता बस जिस आँख में जन्म लेते हैं उसकी तासीर से हो जाते हैं।
1. इस पतझड़ तेरी याद झर रही हैं सूखते पत्तों की तरह बस एक चिंगारी काफ़ी है तेरे दीदार की शोला भड़काने को। 2. इस पतझड़ तेरी याद से कुरेदे हुए कुछ ज़ख्म सूख रहे हैं और कुछ ख्म हरे हो रहे हैं तेरी बिसरी यादों से।
प्रेम मन में समाया ठहरा और चला गया। नहीं बचा कुछ भी कोई याद कोई सपना कोई उम्मीद कोई बिछोह कोई दुःख कोई अवसाद कोई राग द्धेष कुछ भी तो नहीं। फिर इक दिन पता चला इक टुकड़ा प्रेम बचा रह गया मन में किसी फाँस की तरह इक बूँद प्रेम बचा रह गया घास पर ओस की तरह इक पल प्रेम बचा रह गया कहीं ठहरे हुए समय की तरह। -----------------------------------------------------------------
मैं जानता हूँ तुम्हारी ये छोटी छोटी गोल सी आँखे ना तो नीली झील सी गहरी हैं कि इनमें डूब जाऊं मैं ना ही ये चंचल चितवन मृग नयन जैसी है जिनसे प्यार में डूब सकूँ मैं कमल दल जैसी भी नहीं हैं कि पूजा कर सकूँ मैं फिर भी बहुत खूबसूरत हैं तुम्हारी आँखें उतर आता है खूं उनमें आज भी हर बेजा बात पर बचा हैं इनमें पानी नहीं मरा है अभी तक इन आँखों का पानी। -----------------------------------
शाम ढले मद्धम हो बदल जाती है चाँद में और हर रात धीरे धीरे मरते हुए बन के सितारा जड़ जाती है आकाशमें बस रोज़ यूँ ही बढ़ता जाता है सितारों का ये जमघट रफ्ता रफ्ता तमाम होती ज़िंदगी के साथ में। -----------------------------
परजीवी कुछ कीटाणु कुछ विषाणु कुछ वनस्पतियां और एक खास प्रकार की आदमी की प्रजाति ही नहीं होते सबसे बड़े परजीवी होते हैं हमारे दुःख
दुःख जब एक बार किसी से कर लेता है परिचय जाने अनजाने नहीं भूलता जल्द उस को पहले कभी कभी मिलना होता है दुःख का उस व्यक्ति से धीरे धीरे गाढ़ा होने लगता है परिचय फिर उसके अंदर ही बना लेता है पैठ तब मज़े से भीतर ही भीतर जीवन रस पीकर दुःख अपने अंदर से ही पैदा कर देता है कुछ और दुखों कमी पड़ती है तो कुछ और दुखों को कर लेता है बहार से आमंत्रित सिलसिला तब तक अनवरत चलता रहता है जब तक वो व्यक्ति नहीं हो जाता मिट्टी तब दुःख बतियाते हैं उफ्फ ! कितना बेवफा निकला हमने जिसका अंत तक साथ नहीं छोड़ा उसने हमारी ज़फ़ा का ये सिला दिया चलो छोड़ो इसे कोई और ठिकाना ढूँढ़ते हैं और उसके आँगन में अपनी महफ़िल सजाते हैं।
कुछ दिन पहले अपने से बहुत बहुत बेशतर एक कामरेड को अपने से कमतरों पर अहंकार भरा उपहास करते देखा था तब पहली बार किसी बेशतर पर गुस्सा नहीं बहुत बहुत दया आई थी आखिर क्यों भूल जाते हैं बेशतर अपनी बेशी के दम्भ में कि हर का वज़ूद है किसी के होने से कमतर हैं तो हैं बेशतर जैसे अंधेरे के होने से है रोशनी की हनक दुःख ही गढ़ते हैं सुख की परिभाषा बुराई तय करती है अच्छाई की सीमा गरीबी भोग कर ही समझ में आती है अमीरी वे नहीं जानते जिस दिन ख़त्म हो जाएंगे सारे कमतर उस दिन बहुत से बेशतर भी आ जाएंगे सीमान्त पर और जब शिनाख़्त होगी बचे बेशतरों में कुछ कमतरों की और सीमान्त से उनको धकेल दिया जाएगा बाहर तब समझ में आएगा एक बेशतर को क्या होता है किसी बेशतर के लिए दया का उपजना । --------------------------------------------------- एक कमतर का प्रलाप ('प्रलाप 'शब्द शिरीष जी से उधार )
यादें मन के किसी कोने में इकठ्ठा होती रहती हैं किसी ख़ज़ाने की तरह छन से बाहर आती हैं किसी कठिन समय में और फ़ैल जाती हैं मन के आकाश पर बचाती है आदमी को स्खलित होने से उस समय में। जैसे दुःख से गीले मन में कोई याद छन से आती है चटक धूप की तरह और सोख लेती है सारी आर्द्रता जैसे किसी उदास लम्हे में इक याद आती है फूलों की खुशबू लिए ताज़ा हवा के झोकों की तरह और बहा ले जाती है सारी उदासी जैसे ज़िंदगी के किसी बदरंग मोड़ पर छन से उड़ आती है कोई याद सतरंगी इन्द्रधनुष की तरह और रंगों से भर देती है दुनिया जैसे जेठ माह से गुज़रते जीवन समय में किसी मीठे सपने की याद सावन भादों जैसे मेघ बरसकर कम कर जाती है ताप
जैसे कनपटी पर या होठों और गालों पर उम्र की सफ़ेद लकीरों के उभरने पर छन से पहले क्रश की मीठी सी याद आती है किसी खिज़ाब की तरह और कर जाती है नामुराद सफ़ेद लकीरों को काला जैसे चेहरे पर पकी उम्र की झुर्रियों के उग आने पर छन से पहले प्यार की याद छा जाती है चेहरे पर नूर की तरह और मिटा देती है सिलवटों का नामोनिशां दरअसल यादें भी बहन की गुल्लक मां के चुटपुटिया बटुए और दादी मां की ट्रंक में सहेज कर रखी पोटली की तरह गाढ़े समय में
सावधान खुला छोड़ दो हमारे हिस्से का आसमान हम आ रहे हैं गाने को अंधेरों का शोकगीत और करने मुनादी कि उन्हें पहुँचा दिया है उनके अंजाम तक नहीं डरेंगे अब कि दुखों के पेड़ से उतर कर बेताल आ बैठेगा फिर फिर हमारे कन्धों पर अब हम ओढ़ कर धूप खेलेंगे खुशी गाएंगे सपने नाचेंगे ज़िंदगी …ज़िंदगी …ज़िंदगी
1. एक अपारदर्शी समय में जब सबने अपने को छुपा रखा है कई कई तहों के भीतर तुम इतनी पारदर्शी हो लगता ही नहीं कि तुम देह हो देह के पार तुमने बसा रखी है एक दुनिया जो तुम्हारी और सिर्फ तुम्हारी है दिखाई देती है साफ़ साफ़। 2. तुम्हारी देह पर सजे हैं जो भी आधे सच और आधे झूठ उसका पूरा सच और झूठ दिखाई देता है उस पार तुम्हारे कहे गए हाँ जो भीतर ना थीं और तुम्हारी ना जो भीतर हाँ थे सब लटके पड़े हैं तुम्हारी देह के उस पार उल्टे चमगादड़ों की तरह जो बाहर निकलने की कोशिश में ध्वनि तरंगों की तरह लौट लौट आते हैं बार बार देह से टकरा कर फिर फिर लटक जाते हैं उल्टे उसी अंधेरी खोह में जहां लटकते आएं हैं सदियों से। 3. ये जो तुम्हारी देह पर उदास मुस्कान और बिखरी सी ख़ुशी टंगी हैं ये भी आधा सच है पूरा सच उस पार है जहाँ दुखों का एक पूरा आकाश पसरा पड़ा है भटकती आत्माओं की तरह दबे कुचले सपने हैं अतृप्त इच्छाओं के उमड़ते घुमड़ते बादल हैं असहमतियों का लहराता अशांत समंदर है और बग़ावत का ज्वालामुखी बस फटने को है देह ने बलात् रोक रखा है आने वाली उस प्रलय को जिससे बननी है एक नई सृष्टि 4. आखिर कब तक देह का बाँध रहेगा कब तक तुम्हारा ये बेबस उधार सा अपना जीवन जीवन का अपना नहीं बनेगा।
सबसे पहले आते हैं अक्षर अक्षर गढ़ते हैं शब्द शब्द से बनते है वाक्य वाक्य बनाते हैं पृष्ठ पृष्ठों से बनते हैं अध्याय अध्याय मिलकर लेते हैं आकार पुस्तक का अचानक आता है एक शीर्षक किसी सामंत की तरह मिट जाती है सबकी पहचान सब जाने जाते हैं उस शीर्षक से।
बहेलिया पहले डालेगा चुग्गा आश्वासनों का उसमें मिलाएगा सुनहरे भविष्य के सपनों की अफीम जब मदहोश हो जाएंगे कबूतर सारे तो बिछाएगा मजबूत जाल जिसका एक सूत्र होगा नस्ल का एक बतियाने की बोली का एक रहने की डाल का एक उनके शरीर के रंग का जो रंगा होगा धर्म और देशभक्ति के गहरे रंगों से इस बार बहेलिया नहीं खड़ा होगा पेड़ के पीछे क्योंकि वो जानता है उनके उड़ जाने की बात बल्कि हाथ में लिए चुग्गा खड़ा होगा कबूतरों के पास और पेड़ के पीछे होंगे बहेलिए के व्यापारी मित्र जिनकी गिद्ध दृष्टि टिकी होगी कबूतरों के घोंसलों पर और भिड़ा रहे होंगे जुगत पेड़ों को कब्जाने की इस बार नहीं उड़ पाएंगे मदहोश कबूतर बाई द वे उड़ भी जाएं तो जाएंगे कहाँ? चूहे के पास ही ना ! पर वे नहीं जानते कि चूहा भी मिल चुका है पेड़ के पीछे वाले व्यापारियों से और खुद भी बन गया है बड़ा बहेलिया उसके जाल कुतरने वाले दांत हो गए हैं भोथरे और उसके हाथ लग गया है और भी ज्यादा मदहोशी वाला रसायन सीख गया है कबूतरों को जाल में फंसाए रखने की जुगत वो चलाएगा अस्मिता का जादू नहीं हो पाएंगे आजाद कबूतर तो मित्रों कहानी थोड़ी बदल गई है नमूदार हो गए हैं कुछ नए किरदार बहेलिया सीख गया है कुछ नए दांव पेंच कबूतर भूल गए हैं कुछ कुछ एकता का पाठ।
क्लासरूम में कभी ख़त्म ना होने वाली हमारी बातों के बीच वो अनकहा और पलास के सिंदूरी दहकते फूलों से लदे पेड़ों के नीचे टहलते हुए हमारी लम्बी खामोशियों के बीच बहुत कुछ कहा गया सीनेट हाल के कॉरीडोर में तैरती हमारी फुसफुसाहटें और चबूतरे पर बैठकर गाये गीतों की हमारी गुनगुनाहटें आनंद भवन के सीढ़ीनुमा लॉन पर गूंजती हमारी खिलखिलाहटों से मिलकर बनी गुलाब के अनगिनत रंगों की मौज़ूदगी में अनजाने लोगों के होठों पर तैरती रहस्यमयी मुस्कान और उनकी आँखों की चमक से साहस पाती हमारी कहानी बन चुकी थी प्रतिरोध का दस्तावेज जिसे जाना था संगम की ओर मिलन के लिए पर पता नहीं क्या हुआ क्यों बहक गए तुम्हारे कदम और चल पड़े कंपनी बाग़ की तरफ जहाँ ब्रिटेन की महारानी की तरह तुम्हें करनी थी घोषणा एक युग के अंत की ताकि साध सको तिज़ारत का बड़ा मुक़ाम।
बताओ तो ज़रा कैसे बिना कोई शिकन लिए चहरे पर बने रहते हो इतने बड़े कलाकार कि गरीब की थाली में परोसकर कुछ आश्वासन छीन लेते हो उसके मुँह का कौर और वादों का झुनझुना पकड़ाकर कर लेते हो मासूम सपनों को अपनी तिज़ोरी में कैद बताओ तो ज़रा 'एकता' के नारे डालकर मज़दूर की झोली में कैसे उसकी बिछावन को बना लेते हो अपने पैरों के नीचे की रेड कार्पेट कैसे किसान में 'अन्नदाता' होने का सब्ज़बाग़ जगाकर उसकी हाड़तोड़ मेहनत के अन्न को बदल देते हो अपनी रंगीन शाम के 'चखना' में कुछ तो खुलो बताओ तो ज़रा कैसे खून के लाल रंग को हरे भूरे नीले सुफ़ेद रंग में बदल कर कर देते हो रंग बिरंगा और उससे लगी आग के धुँए से कर देते हो पूरे आसमां को स्याह आखिर कैसे आदमी के दुखों को बना लेते हो अपने बेहया सुखों का तकिया और बनकर तीन बंदर बजाते हो चैन की बंशी। कुछ तो बताओ कैसे आदमी के भीतर सुलग रही आग को अपनी धूर्तता भरी आवाज़ से साधकर बना लेते हो अपनी ताकत तथा अपनी अय्याश सत्ता की नींव। कुछ तो गिरह खोलो और बोलो कुछ तो पता चलने दो आदमी से सत्ताधारी मठाधीश बनने के अनिर्वचनीय सुख' वाले तिलिस्मी सफ़र का ताकि कोशिश हो सके इस तिलिस्म से बचाने की आने वाली नस्लों को।