Friday, 19 May 2017

घरौंदा


घरौंदा 
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समय रुका हुआ
अठखेलियां कर रहा है 
धूप के शामियाने में 
छाँव चांदनी सी बिछी है 
ओस  है  कि दूब के श्रृंगार में मग्न  है  
गुलाब अधखिले से बहके है 
सूरज की किरणें पत्तों के बीच से 
झाँक रही हैं बच्चों की शैतानियों सी 
सरसराती सी हवा  है कि महका रही है फ़िज़ां 
मस्ती में झूम रही  है  डाल 
और पत्तों ने छेड़ी हुई है तान 
चिड़ियाँ कर रही  है  मंगल गान
तितलियाँ बिखेर रहीं  है रंग
कि शब्द 
तैर रहे हैं फुसफुसाते से 
कि कुछ सपने बस अभी अभी जन्मे है  
कभी बिलखते कभी खिलखिलाते 
किसी नवजात से 
हाथ पैर चला रहे हैं 
कि बस अभी दौड़ पड़ेंगे 

दरअसल यहां एक घरौंदा है 
और उसमें प्यार रहता है। 
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ये तेरा घर ये मेरा घर 
घर बहुत हसीं है. 




Friday, 12 May 2017

बुद्ध हो जाना


बुद्ध हो जाना 


अक्सर
कुछ ख्वाब 
जो तुम्हारे भीतर
जगते हैं हक़ीक़त की तरह 

फिर वे

होठों से
आग आग दहकते हैं
पलाश की तरह
बसंत बसंत खिलते हैं
अमलतास की तरह
प्यार प्यार महकते हैं
गुलाब की तरह
शब्द शब्द झरते हैं
हरसिंगार की तरह

फिर कोई 

ओक ओक पीता है 
अमृत की तरह 
स्वर स्वर सुनता है 
संगीत की तरह
आग आग जलता है 
परवाने की तरह  

और 
फिर फिर निर्वाण पाता है 
बुद्ध की तरह। 
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तो जीवन की पराकाष्ठा  बुद्ध हो जाना है ?

Monday, 8 May 2017

आओगे ना


आओगे ना


सुनो 
तुम जानते हो 
वो एक पल जो बचा के रखा था 
तुम्हें सौंप देने के लिए 

पता नहीं 
कब 
कैसे 
छिटक कर आ गिरा था 
दिल के किसी कोने में 
और फिर 
तुम्हारी यादों के मौसम में 
तुम्हारे सौंदर्य की खाद और 
अदाओं की वर्षा से 
अंकुरित हो गया गया एक पौधा 
प्रेम का
जो तुम्हारे स्नेह की धूप पाकर 
फ़ैल गया 
विशाल वट वृक्ष सा। 

सुनो 
जब भी ज़िंदगी के ताप से झुलसो  
और मन हो 
तो आना इस वृक्ष की सघन छाँव में 
रुको ना रुको 
कुछ पल ठहरना 
सुस्ताना  
और पूर्ण करना तुम एक अनंत प्रतीक्षा को  
तुम जानते हो 
वृक्ष  
अनजाने यात्रियों के बिना कितने अधूरे होते हैं 

आओगे ना। 
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क्या प्रतीक्षाएँ अपूर्ण होने के  लिए अभिशप्त होती हैं। 




Sunday, 16 April 2017

प्रतीक्षा का रंग

 प्रतीक्षा का रंग
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सुनो जोगन
तुम विराग में भी ढूंढ रही हो राग 
और खड़ी हो चिर प्रतीक्षा  में 
कि विराग से कभी तो छलकेगा राग रस 

और उस पार जोगी देख रहा है 
उजले स्याह होते 
तुम्हारी प्रतीक्षा के रंग 
पढ़ रहा है उसका इतिहास 
जो अनंत काल तक जाता है पीछे 
जब पहली बार आदम और हव्वा के मन में जागी थी आदिम इच्छा 
देख रहा है उसका लगातार विस्तार पाता भूगोल 
क्षितिज पार फ़ैल रही है जिसकी सीमाएं 
माप रहा है आकार 
जो फ़ैल रहा है अंतरिक्ष में 

तुम्हें शायद पता नहीं  
प्रतीक्षाएँ चाहे जैसी हो 
स्याह होता जाता है उनका रंग 
पुराना होता जाता है इतिहास  
सीमाओं पार फ़ैलता जाता है भूगोल 
अनंत दूरियों को नापता हुआ 
जहां से लौट कर वापस नहीं आतीं अनुगूँजे भी 

प्रतीक्षा अक्सर दुःख की भाषा गढ़ती है 
और तुम चुन रही हो वही 
जो तुम्हें नहीं ही चुनना था। 

Friday, 14 April 2017

मोको कहाँ ढूंढे रे


मोको कहाँ ढूंढे रे 
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'मैं इक परछाई हूँ 
या हूँ छलावा 
या हूँ कुछ भरम सा'
ये मानना ही भरम है तुम्हारा
तुम ढूंढ रही हो बाहर 
कुछ ठोस ठोस सा 
और मैं हूँ तुम्हारे भीतर 
तरल तरल सा 

जैसे होती है बारिश में आर्द्रता 
मैं हूँ तुम्हारे मन में गीलेपन सा 
जैसे होता है आग में ताप  
मैं हूँ तुम्हारे प्यार में उष्मा सा 
जैसे होती है चांदनी में शीतलता
मैं हूँ तुम्हारी आहों में ठिठुरन सा  
जैसे होते हैं किताबों में फलसफे 
मैं हूँ तुम्हारे ख्यालों में विचारों सा 
जैसे होता है माटी में उर्वरता 
मैं हूँ तुम्हारी साँसों में जीवन सा 

जैसे होती है मृग कुण्डिली में कस्तूरी 
मैं हूँ तुममें अहसास भरा भरा सा   
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ना मंदिर में ना मस्जिद में ना काबे कैलास में
मैं तो तेरे पास में बन्दे मैं तो तेरे पास में


Monday, 3 April 2017

तुम्हारे लिए


तुम्हारे लिए 
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वे तुम्हारी बेवजह की बतकही
दिल के आँगन में जो पडी थी 
बेतरतीब सी
इस तनहा समय में उग आयी हैं
बेला चमेली के पेड़ों की तरह
जिनसे यादें झर रही हैं
फूलों सी 

तुम्हारी बेवजह बेसाख्ता फूट  पड़ती खिलखिलाहट
अब कानों में गूंजती है
बिस्मिल्लाह की शहनाई पर बजाई किसी धुन सी 

तुम्हारी यूँ ही निकली आहें
घुल रही हैं मेरी साँसों में
अमृत सी 

वो यूं ही बेसबब कनखियों से देखना
आ बैठा है हौले से पीठ पर 
जैसे किसी ने हल्दी लगे हाथो से
छाप दिए हों अपनी हथेलियों के निशां
किसी सगुन से 
और जोड़ दी हो अपनी किस्मत की रेखाएं मेरे साथ

कि कुछ भी बेवजह होना  
बेवजह नहीं होता
जैसे साँसों का आना जाना 
नहीं  होता बेवजह। 
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ज़िन्दगी में आने वाली हर चीज़ इतनी अर्थपूर्ण क्यूँ होती है। 













Wednesday, 15 February 2017

स्थगित पल




उस दोपहर 
जब सारे ब्रह्मांड का नाद सौन्दर्य 
सिमट आया था तुम्हारी वाणी में 
तुम्हारे शब्द मेरे भीतर 
झर रहे थे बसंत की तरह 
तुम्हारी देहगंध टकरा के तन से मेरे 
फ़ैल गयी थी फ़िज़ा में 
तुम्हारी नेह दृष्टि 
समा गई थी मन के किसी कोने में
तुम्हारी मुस्कान तुम्हारे अधरों से होती हुई 
आ बैठी थी मेरे होटों पे 
ठीक उसी समय 
एक पल स्थगित कर दिया था मैंने 
सबसे बचा के  
कभी भविष्य के लिए 
गर मिले कभी तुम 
तो सौप दूँगी तुम्हे 

तुम आओगे ना प्रिये

फिलहाल तो मैं जी रही हूँ 
तुम्हारा वो स्थगित पल ! 

Wednesday, 1 February 2017

लम्हा लम्हा


कुछ लम्हे दीदार
कुछ लम्हे ख्याल
कुछ लम्हे इन्तजार 
कुछ लम्हे इकरार
कुछ लम्हे बातें
कुछ लम्हे वादे
कुछ लम्हे खुशी
फिर
इन लम्हों का सिला
हर लम्हा बस
तेरी याद 
तेरी याद।

Tuesday, 24 January 2017

स्वप्न


स्वप्न 
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सुनो
तुम
देखना एक दिन

उधेड़ दूंगा तुम्हारे दुखों की सिवन को
और  बिखेर दूंगा उन्हें कर चिंदी चिंदी सा 

कि तुम्हारे शरीर पर सजा दूंगा 
खुशियों को 
गहनों सा 
तुम्हारी आत्मा पर टांक दूंगा
अपने जज़्बातों को 
सितारों सा
भर दूंगा तुम्हे प्रेम से
कि तुम महका करोगी 
कस्तूरी सी 

कि बिछ जाएगा प्रेम हमारे दरम्यां
पर्वत पर बर्फ की चादर सा
या फ़ैल जाएगा वनों की हरियाली सा
कभी बहेगा नदी के नीर सा 
तो बरसेगा  सावन की घटाओं सा 
गर झरा तो 
झरेगा हरसिंगार के फूलों सा 
और दौड़ेगा धमनियों में लहू सा 

कि अपने अहसासात के हर्फ़ों से 
रच दूंगा एक प्रेम महाकाव्य 
जिसे पढ़ेंगे   
निर्जन वन प्रांतर में 
बिछा के धरती 
ओढ़ के आसमाँ  
जोगन जोगी सा 

कि उतर आएंगे किसी किताब के सफे पर 
बन के  
किसी किस्से कहानी के 
हिस्से सा।  
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ये किस्से कहानी क्या सच में सच होते होंगे !

Sunday, 22 January 2017

इंतज़ार




इंतज़ार 
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कुछ सूखे सूखे से हैं पत्ते 
और झुकी झुकी सी डालियाँ

कुछ रूकी रुकी सी है हवा 
और बहके बहके से कदम 

कुछ मद्धम मद्धम सा है सूरज 
और सूना सूना सा दिन 

कुछ फीका फीका सा है चाँद 
और धुंधली धुंधली सी रात 

कुछ खाली खाली सी है शाम  
और खोया खोया सा दिल 

क्यों रोए रोए हैं ये सब 
क्या कहीं खोया है मेरा सनम  
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अक्सर ये इंतज़ार इतना मुश्किल क्यूँ होता है 

Saturday, 7 January 2017

उरूज पर जो हैं ना।




उरूज पर जो हैं ना
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एक शोख़ शरारत करने का दिल करता  है 
ये जो तुम्हारे खूबसूरत से पाँव हैं ना 
चुपके से छूकर 
दिल की धड़कनें बढ़ाने का  दिल करता है 

एक शोख़ शरारत करने का दिल करता  है 
ये जो तुम्हारे नरम मुलायम से हाथ हैं ना 
चुपके से छूकर 
दिल के जज़्बात बेकाबू करने का दिल करता है 

एक शोख़ शरारत करने का दिल करता  है 
ये जो तुम्हारी झील सी ऑंखें हैं ना 
चुपके से छूकर 
खुद को तुम में समा देने का दिल करता है 

एक शोख़ शरारत करने का दिल करता  है 
ये जो तुम्हारे गुलाबी से होंठ  हैं ना 
चुपके से छूकर 
तुममें घुल जाने का दिल करता है 

ये जो मेरा ख्वाहिशों से भरा दिल है ना 
और दिल में जो शोख शरारतें हैं ना
आखिर उरूज पर  हैं ना
इसलिए कुछ करने का दिल करता है 
कुछ होने का दिल करता है। 
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ये दिल आखिर ख्वाहिशों से भरा क्यूँ होता है। 

Saturday, 31 December 2016

नया साल



नया साल 
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एक टुकड़ा सूरज अधूरी सुबह के लिए
एक हिस्सा रोशनी अधूरे दिन के लिए
एक कोना चाँद अधूरी रात के लिए
कुछ मुस्कुराहटें अधूरे क़ह्क़हों के लिए 
थोड़े से रंग अधूरी चाहतों के लिए 
थोड़ी सी उम्मीद अधूरे सपनों के लिए

पूरा मिले ना मिले 
बस इस थोड़े से बसर हो 
ज़िन्दगी मुकम्मल हो ना हो
मुकम्मल सी हो 
कि ज़िन्दगी अपनी हो ना हो
अपनी सी हो। 
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नए साल के इस मुबारक मौके पर कुछ हो ना हो 
कुछ आस हो, 
अपनों का साथ हो। 

Thursday, 15 December 2016

लिखना 'प्रेम'








लिखना 'प्रेम'
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जब बहुत सारे लोग कर रहे थे प्रेम
सीखना चाहा था मैंने लिखना
लिखना 'प्रेम'

तमाम लोगो के प्रेम करते रहने के समय में

तुम अचानक से आई थीं एक दिन
भोर में फूल के पत्ते पर सिमटी ओस की बूँद की तरह
तब देखा था तुम्हें पहली बार
मन की ज़मीं पर टपका था एक बूँद प्रेम
जिसे बदल जाना था दरिया में
तब चाहा था लिखना प्रेम।

तुम  लगी थी मेरे प्रेम का आलंबन 

कुछ कुछ खड़ी पाई सी
और मैंने सीखा लिखना प्रेम के प की खड़ी पाई।

ये सीखना था बसंत के उल्लास सा

सब कुछ खिलने लगा था मन के क्षितिज तक
महकने लगा था अबूझ संसार
और मैं किसी डाल सा लचकने लगा था
तुम्हारे प्यार के फूलों को खुद पे सजाये हुए
और लचक कर झुक गया था तुम्हारी ओर
तुम्हारे स्वीकरण से मिल गया था मैं तुममें
सीख लिया था लिखना  प्रेम का 'प'।

तब बर्फ सी जमी तुम पिघलने लगी थी

मेरे प्रेम की उष्मा से
बहने लगी थी प्रेम की अजस्र धारा सी
मैंने सीख ली थी 'प्र' में लगाना र की मात्रा।

हमारे प्रेम के भार में

तुम झुकती गयी थी लगातार
इस कदर
कि तुमने खुद को बना लिया था हमारे प्रेम का आधार
कि तुम धंसने लगी थी ज़मीं में किसी पेड़ की जड़ सी
कि अपने को मिटा कर भी 
सींच रही थी प्रेम को
और मैं तुम्हारे प्रेम से फला फूला
तन गया था किसी पेड़ की सबसे ऊंची डाल सा
कि मैंने सीख ली थी प्रेम के प्रे में 'ए की मात्रा लगाना।

तुम प्रेम को प्रेम बनाए रखने के लिए

धंसती जा रही थी गहरे
और गहरे
और मैं प्रेम के आधे अधूरे प्रे को लिखना सीखने से गर्वोन्नत
तनता हुआ उठता जा रहा था ऊंचा
और ऊंचा
पर ये वो प्रेम तो नहीं था ना
कि हम जा रहे थे दो विपरीत ध्रुबों की ओर
तुम त्याग की मूर्ति
और मैं अहम् का पुतला बन।

आखिर कब तक तुम सींचती

अमर बेल से लिपटे हमारे प्रेम वृक्ष को
कि मेरे अमरबेल बन जाने से तय हो गयी
नियति हमारे प्रेम की
कि सूखना ही था प्रेम वृक्ष
और प्रेम वृक्ष के सूखते हुए देख 
लगा था हम दोनों को ही 
कि सूखने से बचाना है इसे 
तो दोनों को ही मुड़ना होगा विपरीत दिशा में 
कि तुम्हें कुछ सींचना होगा अपने स्व को 
और मुझे सुखाना होगा अपने अहम् को 
इसे सीखने में जो वक्त लगना था 
ये वही था जो लगता है 
'प्रे' से 'म' तक आने में।

तुम्हारे स्व के जगने 

और मेरे अहम् के मरने से 
हम एक बार फिर खड़े हो गए थे दो समानांतर पाई से 
कि समय की धूप छाँव ने सिखाया था 
प्रेम 
द्वैत के अद्वैत में बदल जाने में है 
आत्मा के परमात्मा में विलीन हो जाने में है  
मेरा तुम में समा जाने में है
और इस तरह 
समय की भट्टी में 
तुम्हारे प्रेम के ईंधन से जली आग के ताप से 
कपूर सा उड़ गया था मेरे भीतर का अहम् 
कि मैं पूरी तरह मुड़ के समा गया था तुम में 
और मैंने सीख लिया था लिखना प्रेम के 'म' को ।

हाँ अब ये सच था 

कि एक ऐसे समय में 
जब सब कर रहे थे प्रेम 
मैंने सीखा लिया था लिखना 'प्रेम'।  
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प्रेम करने वाले समय में प्रेम लिखना इतना खूबसूरत क्यूं होता है।  





Saturday, 10 December 2016

इस सर्द मौसम


इस सर्द मौसम 

मिरा यार 
इस सर्द मौसम 
मेहताब नहीं 
आफ़्ताब सा लगता है 
शरारतन खुद को छुपा लिया है 
दीवार ओ धुंध के पीछे 
और हम हैं कि 
इक झलक उसकी पाने को 
इकटक सरे आसमाँ देखा करते हैं 
कि ख़ुदा के आगे हाथ उठते हैं 
उसके इश्क़ की रोशनी के लिए। 
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कि सर्द मौसम तेरी याद इतनी बेदर्द क्यूँ हो जाती है।  









यादें

                                                            (गूगल से साभार )

यादें 
====

याद 
कि 
इक बीता लम्हा 
लम्हों की बारातें 
लम्हों में बीती बातें 
बातों की यादें। 

याद 
कि 
इक टपका आंसू 
आंसुओं की लड़ियाँ 
लड़ियों में ग़म के किस्से 
किस्सों की यादें। 

याद 
कि 
इक अटकी फांस
फांसों के फ़साने  
फसानों की टीसें 
टीसों की यादें। 

याद 
कि 
इक टूटा ख्वाब 
ख्वाबों की रातें
रातों की तन्हाइयां 
तन्हाइयों की यादें 
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ये यादें इतनी संगदिल क्यों होती हैं ?

चीजें अक्सर ऐसे ही बदल जाया करती हैं !

                                                      (गूगल से साभार)

चीजें अक्सर ऐसे ही बदल जाया करती हैं !
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कुछ फासले 
दूरियां नहीं होती 
प्रेम होती हैं 

कुछ बातें 

बतकही नहीं होती 
प्रेम होती है

कुछ दोस्ती 

रिश्ते नहीं होतीं 
प्रेम होती हैं 

कुछ लड़ाईयां 

अदावतें नहीं होती 
प्रेम होती हैं 

प्रेम में चीजें

अक्सर
ऐसे ही बदल जाया करती हैं !  
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चीजें वैसी क्यों नहीं होती जैसी दिखाई देती हैं  

ज़िन्दगी

ज़िन्दगी 
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ज़िन्दगी 
सर्दियों के किसी इतवार की अलसुबह सी 
अलसाई अलसाई
बिस्तर में ही गुज़र बसर हो जाती है
ना आगे खुद बढती है
ना बढ़ाने की इच्छा होती है।
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अपने अपने युद्ध


ऐन उस वक्त 
जब एक युद्ध हो रहा होता है सीमा पर 
कई युद्ध कर रहे होते हैं लोग घरों में  
सीमा पे लड़े जा रहे युद्ध से अधिक विध्वंसक  
वे लड़ रहे होते हैं अपने अपने भय से। 

एक युद्ध कर रहे होते हैं माँ बाप

अपनी लाठी के हाथ से छूट जाने के भय से और 
जीवन की साँझ की उम्मीद 
दो मज़बूत कंधों के टूट जाने के भय से। 
पत्नी लड़ रही होती है
पहाड़ सी ज़िन्दगी से लड़ने वाले साथी का हाथ छूट जाने के भय से 
बहन लड़ रही होती है एक कलाई के खो जाने के भय से 
एक बेटी लड़ रही होती है
अपने सबसे बड़े हीरो की उंगली छूट जाने के भय से  
और वे सब एक साथ लड़ रहे होते हैं 
पेट की आग बुझाने के लिए होने वाली चिंता के भय से 

सुनो 

अब जब भी बात करो तुम युद्ध की 
एक बार उन युद्धों की सोचना 
जो किए जा रहे हैं अपने अपने सपनों के मरने के भय से 
और फिर कवि की  उक्ति याद करना कि
 'सबसे खतरनाक  होता है सपनों का मर जाना'
उसके बाद भी हिम्मत बचे 
तो बात करना युद्ध की।  
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क्या युद्ध इतने ज़रूरी होते हैं ?

पुल


पुल
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दी का पुल
उसके दो किनारों को जोड़ता है
ये भ्रम मात्र है।
पुल कुछ लोगों की ज़रूरतों की
पूर्ति का साधन भर है
और किनारों की निरंतरता को बाधित करने का साधन भी।
उनकी इच्छा तो
नदी के प्रेम में
उसके सहयात्री बने रहने में है
और उसके सागर में
विलीन होने के बाद
खुद को मिटा देने में भी।
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किनारों का मिलना ज़रूरी तो नहीं है।

1


ये कैसा तूफान है ज़िन्दगी में इस बार
ना हलचल है कोई ना शोर
आहें हैं सिसकियाँ हैं
बस यही निशां हैं बर्बादी के चारों ओर।
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