अभिव्यक्ति
Saturday, 10 December 2016
ज़िन्दगी
ज़िन्दगी
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ज़िन्दगी
सर्दियों के किसी इतवार की अलसुबह सी
अलसाई अलसाई
बिस्तर में ही गुज़र बसर हो जाती है
ना आगे खुद बढती है
ना बढ़ाने की इच्छा होती है।
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