ये कैसा तूफान है ज़िन्दगी में इस बार ना हलचल है कोई ना शोर आहें हैं सिसकियाँ हैं बस यही निशां हैं बर्बादी के चारों ओर। ---------------------------------
हर किसी के बाहरी आवरण में छिपा हुआ है और भी बहुत कुछ अक्सर सुनहरी धूप जिस्म को कर देती है काला और साँवली छाया कर देती है चमड़ी को और अधिक उजला जैसे कुछ बड़े आदमी साबित होते हैं बहुत बौने और छोटे आदमी उठा लेते हैं अपने को आसमान से भी ऊँचा। -----------------------------------------------------------------
ताजमहल को देख समझ आता है कितना मुश्किल है एक शब्द को आकार दे पाना लैला मजनू ,हीर रांझा ,शीरी फरहाद के किस्से पढ़ समझ आता है कितना मुश्किल है एक शब्द को निभा पाना पद्मावती के जौहर को जान समझ आता है कितना मुश्किल है एक शब्द से गीलेपन को सोख पाना खाप पंचायतों के फतवों को सुन समझ आता है कितना मुश्किल है एक शब्द को जी पाना फिर भी ज़ुर्रत होती है एक शब्द को गले लगा पाने की आओ मैं और तुम भी करें वही ज़ुर्रत हम भी एक शब्द को दें आकार विस्तार छुअन कुछ रंग जीवन और लिख दें ज़िंदगी पर एक शब्द प्रेम। --------------------------------------------------------
तेरे इंतज़ार के सफर में यादें मील का पत्थर बनती गयीं ना सफर मुकम्मल हुआ ना यादों का सिलसिला रूका। ------------------------------------ ये सफर कभी ख़त्म ही नहीं होता।
इस सर्द मौसम तेरी याद की भीनी भीनी खुशबू घुल रही है सांसों में नरम नरम धूप के अहसास सी समय की धार से मन के उस पार संघनित होती जाती धुंध सी उदासी आहिस्ता आहिस्ता उड़ती जाती भाप सी। ------------------------------------ यादों का मौसम से कोई रिश्ता तो नहीं
(गूगल से साभार)
उस जगह जहाँ हमने कभी गुनगुनाया था प्रेम और बोए थे कुछ सपने एक ज़िंदगी उगाने को अब वो जगह पड़ी हैं वीरान वीरा कुछ उदास उदास बह रहा है एक शोर धीमा धीमा सूखे पत्तों का मोजार्ट और बीथोहोवेन की उदास धुनों सा और मैं सुन हूँ बहका बहका सा। ------------------------------------ नितांत खालीपन वाले इस समय में
एक लड़की का सपना नदी सा होता है बहना चाहती है नदी सी इतराती इठलाती सी बेरोक टोक दुर्गम घाटियों से लेकर समतल मैदानों तक बिखेरती चलती है हरा रंग अपने आस पास और सोखती जाती है काला रंग वही सपना जब एक ग़रीब की आँखों में जन्मता है तो आग सा होता है और उस आग से ज़िंदगी के चारों ओर फैले घने कोहरे को उड़ा देना चाहता है भाप की तरह जला देना चाहता है सारे जुल्म ओ सितम एक अमीर का सपना होता है दूध दूह लेने वाली मशीन सा जिसमें न ममत्व का स्पर्श न भावनाएं न दिल न जिगर वो आदमी की जिंदगी को केवल दूहना और दूहना चाहता है दरअस्ल सपने बिलकुल पानी जैसे होते हैं जिनकी अपनी कोई शक्ल सूरत या आकार नहीं होता बस जिस आँख में जन्म लेते हैं उसकी तासीर से हो जाते हैं।
1. इस पतझड़ तेरी याद झर रही हैं सूखते पत्तों की तरह बस एक चिंगारी काफ़ी है तेरे दीदार की शोला भड़काने को। 2. इस पतझड़ तेरी याद से कुरेदे हुए कुछ ज़ख्म सूख रहे हैं और कुछ ख्म हरे हो रहे हैं तेरी बिसरी यादों से।
प्रेम मन में समाया ठहरा और चला गया। नहीं बचा कुछ भी कोई याद कोई सपना कोई उम्मीद कोई बिछोह कोई दुःख कोई अवसाद कोई राग द्धेष कुछ भी तो नहीं। फिर इक दिन पता चला इक टुकड़ा प्रेम बचा रह गया मन में किसी फाँस की तरह इक बूँद प्रेम बचा रह गया घास पर ओस की तरह इक पल प्रेम बचा रह गया कहीं ठहरे हुए समय की तरह। -----------------------------------------------------------------
मैं जानता हूँ तुम्हारी ये छोटी छोटी गोल सी आँखे ना तो नीली झील सी गहरी हैं कि इनमें डूब जाऊं मैं ना ही ये चंचल चितवन मृग नयन जैसी है जिनसे प्यार में डूब सकूँ मैं कमल दल जैसी भी नहीं हैं कि पूजा कर सकूँ मैं फिर भी बहुत खूबसूरत हैं तुम्हारी आँखें उतर आता है खूं उनमें आज भी हर बेजा बात पर बचा हैं इनमें पानी नहीं मरा है अभी तक इन आँखों का पानी। -----------------------------------
शाम ढले मद्धम हो बदल जाती है चाँद में और हर रात धीरे धीरे मरते हुए बन के सितारा जड़ जाती है आकाशमें बस रोज़ यूँ ही बढ़ता जाता है सितारों का ये जमघट रफ्ता रफ्ता तमाम होती ज़िंदगी के साथ में। -----------------------------
परजीवी कुछ कीटाणु कुछ विषाणु कुछ वनस्पतियां और एक खास प्रकार की आदमी की प्रजाति ही नहीं होते सबसे बड़े परजीवी होते हैं हमारे दुःख
दुःख जब एक बार किसी से कर लेता है परिचय जाने अनजाने नहीं भूलता जल्द उस को पहले कभी कभी मिलना होता है दुःख का उस व्यक्ति से धीरे धीरे गाढ़ा होने लगता है परिचय फिर उसके अंदर ही बना लेता है पैठ तब मज़े से भीतर ही भीतर जीवन रस पीकर दुःख अपने अंदर से ही पैदा कर देता है कुछ और दुखों कमी पड़ती है तो कुछ और दुखों को कर लेता है बहार से आमंत्रित सिलसिला तब तक अनवरत चलता रहता है जब तक वो व्यक्ति नहीं हो जाता मिट्टी तब दुःख बतियाते हैं उफ्फ ! कितना बेवफा निकला हमने जिसका अंत तक साथ नहीं छोड़ा उसने हमारी ज़फ़ा का ये सिला दिया चलो छोड़ो इसे कोई और ठिकाना ढूँढ़ते हैं और उसके आँगन में अपनी महफ़िल सजाते हैं।
कुछ दिन पहले अपने से बहुत बहुत बेशतर एक कामरेड को अपने से कमतरों पर अहंकार भरा उपहास करते देखा था तब पहली बार किसी बेशतर पर गुस्सा नहीं बहुत बहुत दया आई थी आखिर क्यों भूल जाते हैं बेशतर अपनी बेशी के दम्भ में कि हर का वज़ूद है किसी के होने से कमतर हैं तो हैं बेशतर जैसे अंधेरे के होने से है रोशनी की हनक दुःख ही गढ़ते हैं सुख की परिभाषा बुराई तय करती है अच्छाई की सीमा गरीबी भोग कर ही समझ में आती है अमीरी वे नहीं जानते जिस दिन ख़त्म हो जाएंगे सारे कमतर उस दिन बहुत से बेशतर भी आ जाएंगे सीमान्त पर और जब शिनाख़्त होगी बचे बेशतरों में कुछ कमतरों की और सीमान्त से उनको धकेल दिया जाएगा बाहर तब समझ में आएगा एक बेशतर को क्या होता है किसी बेशतर के लिए दया का उपजना । --------------------------------------------------- एक कमतर का प्रलाप ('प्रलाप 'शब्द शिरीष जी से उधार )
यादें मन के किसी कोने में इकठ्ठा होती रहती हैं किसी ख़ज़ाने की तरह छन से बाहर आती हैं किसी कठिन समय में और फ़ैल जाती हैं मन के आकाश पर बचाती है आदमी को स्खलित होने से उस समय में। जैसे दुःख से गीले मन में कोई याद छन से आती है चटक धूप की तरह और सोख लेती है सारी आर्द्रता जैसे किसी उदास लम्हे में इक याद आती है फूलों की खुशबू लिए ताज़ा हवा के झोकों की तरह और बहा ले जाती है सारी उदासी जैसे ज़िंदगी के किसी बदरंग मोड़ पर छन से उड़ आती है कोई याद सतरंगी इन्द्रधनुष की तरह और रंगों से भर देती है दुनिया जैसे जेठ माह से गुज़रते जीवन समय में किसी मीठे सपने की याद सावन भादों जैसे मेघ बरसकर कम कर जाती है ताप
जैसे कनपटी पर या होठों और गालों पर उम्र की सफ़ेद लकीरों के उभरने पर छन से पहले क्रश की मीठी सी याद आती है किसी खिज़ाब की तरह और कर जाती है नामुराद सफ़ेद लकीरों को काला जैसे चेहरे पर पकी उम्र की झुर्रियों के उग आने पर छन से पहले प्यार की याद छा जाती है चेहरे पर नूर की तरह और मिटा देती है सिलवटों का नामोनिशां दरअसल यादें भी बहन की गुल्लक मां के चुटपुटिया बटुए और दादी मां की ट्रंक में सहेज कर रखी पोटली की तरह गाढ़े समय में
सावधान खुला छोड़ दो हमारे हिस्से का आसमान हम आ रहे हैं गाने को अंधेरों का शोकगीत और करने मुनादी कि उन्हें पहुँचा दिया है उनके अंजाम तक नहीं डरेंगे अब कि दुखों के पेड़ से उतर कर बेताल आ बैठेगा फिर फिर हमारे कन्धों पर अब हम ओढ़ कर धूप खेलेंगे खुशी गाएंगे सपने नाचेंगे ज़िंदगी …ज़िंदगी …ज़िंदगी