Saturday, 10 December 2016

1


ये कैसा तूफान है ज़िन्दगी में इस बार
ना हलचल है कोई ना शोर
आहें हैं सिसकियाँ हैं
बस यही निशां हैं बर्बादी के चारों ओर।
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फुटकल_2


गागर जितने मन में 
सागर के पानी जितनी हसरतें 
फिर भी मन कितना 
रीता रीता 
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Sunday, 5 June 2016

बाहरी आवरण



हर किसी के बाहरी आवरण में

छिपा हुआ है और भी बहुत कुछ
अक्सर सुनहरी धूप जिस्म को कर देती है काला
और साँवली छाया कर देती है चमड़ी को और अधिक उजला
जैसे कुछ बड़े आदमी साबित होते हैं बहुत बौने
और छोटे आदमी उठा लेते हैं अपने को आसमान से भी ऊँचा।
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Tuesday, 24 May 2016

तमन्नाएँ



ये आसमान पर बिखरे तारे हैं

कि हमारी तमन्नाएँ
दिखते तो खूबसूरत हैं
पर हाथ नहीं आते।
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Friday, 1 April 2016

प्रेम



ताजमहल को देख समझ आता है 
कितना मुश्किल है एक शब्द को 
आकार दे पाना 
लैला मजनू ,हीर रांझा ,शीरी फरहाद के किस्से पढ़ समझ आता है 
कितना मुश्किल है एक शब्द को 
निभा पाना 
पद्मावती के जौहर को जान समझ आता है 
कितना मुश्किल है एक शब्द से 
गीलेपन को सोख पाना 
खाप पंचायतों के फतवों को सुन समझ आता है
कितना मुश्किल है एक शब्द को 
जी पाना  
फिर भी ज़ुर्रत होती है 
एक शब्द को गले लगा पाने की 
आओ 
मैं और तुम भी करें वही ज़ुर्रत 
हम भी एक शब्द को दें 
आकार 
विस्तार 
छुअन 
कुछ रंग
जीवन  
और लिख दें ज़िंदगी पर एक शब्द 
प्रेम। 
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(गूगल से साभार)

Monday, 28 March 2016

इंतज़ार



तेरे इंतज़ार के सफर में 
यादें मील का पत्थर बनती गयीं 
ना सफर मुकम्मल हुआ 
ना यादों का सिलसिला रूका। 

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ये सफर कभी ख़त्म ही नहीं होता।

Wednesday, 27 January 2016

इस सर्द


इस सर्द मौसम
तेरी याद की
भीनी भीनी खुशबू
घुल रही है सांसों में
नरम नरम धूप के
अहसास सी

समय की धार से

मन के उस पार
संघनित होती जाती
धुंध सी उदासी
आहिस्ता आहिस्ता
उड़ती जाती
भाप सी।
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यादों का मौसम से कोई रिश्ता तो नहीं

(गूगल से साभार) 

 







 
 उस जगह
जहाँ हमने कभी
गुनगुनाया था प्रेम
और
बोए थे कुछ सपने
एक ज़िंदगी उगाने को

अब वो जगह

पड़ी हैं वीरान वीरा
कुछ उदास उदास
बह रहा है
एक शोर धीमा धीमा
 सूखे पत्तों का
 मोजार्ट और बीथोहोवेन की उदास धुनों सा
 और मैं सुन हूँ बहका बहका सा।
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नितांत खालीपन वाले इस समय में




Thursday, 29 October 2015

तासीर



एक लड़की का सपना नदी सा होता है
बहना चाहती है नदी सी
इतराती इठलाती सी
बेरोक टोक दुर्गम घाटियों से लेकर समतल मैदानों तक
बिखेरती चलती है हरा रंग अपने आस पास
और सोखती जाती है काला रंग                                      

वही सपना जब एक ग़रीब की आँखों में जन्मता है 

तो आग सा होता है
और उस आग से 
ज़िंदगी के चारों ओर फैले घने कोहरे को 
उड़ा देना चाहता है भाप की तरह  
जला देना चाहता है सारे जुल्म ओ सितम 


एक अमीर का सपना होता है

दूध दूह लेने वाली मशीन सा 
जिसमें न ममत्व का स्पर्श 
न भावनाएं न दिल न जिगर
वो आदमी की जिंदगी को केवल दूहना और दूहना चाहता है

दरअस्ल सपने

बिलकुल पानी जैसे होते हैं
जिनकी अपनी कोई शक्ल सूरत या आकार नहीं होता
बस जिस आँख में जन्म लेते हैं
उसकी तासीर से हो जाते हैं।
(गूगल से साभार) 



इस पतझड़



1.
इस पतझड़
तेरी याद
झर रही हैं
सूखते पत्तों की तरह
बस एक चिंगारी काफ़ी है
तेरे दीदार की
शोला भड़काने को।

2.
इस पतझड़
तेरी याद से
कुरेदे हुए कुछ ज़ख्म
सूख रहे हैं
और कुछ ख्म हरे हो रहे हैं
तेरी बिसरी यादों से। 

Saturday, 3 October 2015

प्रेम




प्रेम 
मन में समाया 
ठहरा 
और चला गया। 

नहीं बचा कुछ भी 

कोई याद 
कोई सपना  
कोई उम्मीद 
कोई बिछोह 
कोई दुःख 
कोई अवसाद 
कोई राग द्धेष 
कुछ भी तो नहीं।

फिर इक दिन पता चला 

इक टुकड़ा प्रेम बचा रह गया 
मन में किसी फाँस की तरह 
इक बूँद प्रेम बचा रह गया
घास पर ओस की तरह
इक पल प्रेम बचा रह गया
कहीं ठहरे हुए समय की तरह।  
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Friday, 25 September 2015

तुम्हारी आँखेँ




मैं जानता हूँ 
तुम्हारी ये छोटी छोटी गोल सी आँखे 
ना तो नीली झील सी गहरी  हैं 
कि इनमें डूब जाऊं मैं 
ना ही ये चंचल चितवन मृग नयन जैसी है 
जिनसे प्यार में डूब सकूँ मैं 
कमल दल जैसी भी नहीं हैं 
कि पूजा कर सकूँ मैं 
फिर भी बहुत खूबसूरत हैं तुम्हारी आँखें 
उतर आता है खूं  उनमें आज भी 
हर बेजा बात पर 
बचा हैं इनमें पानी 
नहीं मरा है अभी तक 
इन आँखों का पानी। 
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Friday, 18 September 2015

ख़्वाहिशें



 हर सुबह 
 जो ख़्वाहिश उग आती है 
 चमकते सूरज की तरह

 शाम ढले
 मद्धम हो बदल जाती है 
 चाँद में 

 और हर रात धीरे धीरे मरते हुए 
 बन के सितारा  
 जड़ जाती है 
आकाश में 

 बस रोज़ यूँ ही बढ़ता जाता है 
 सितारों का ये जमघट 
 रफ्ता रफ्ता 
 तमाम होती  
 ज़िंदगी के साथ में।
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Thursday, 17 September 2015

कोई और घर ढूँढ़ते हैं



परजीवी
कुछ कीटाणु
कुछ विषाणु
कुछ वनस्पतियां
और एक खास प्रकार की आदमी की प्रजाति ही नहीं होते
सबसे बड़े परजीवी होते हैं हमारे दुःख


दुःख जब एक बार किसी से कर लेता है परिचय जाने अनजाने 
नहीं भूलता जल्द उस को 
पहले कभी कभी मिलना होता है दुःख का उस व्यक्ति से 
धीरे धीरे गाढ़ा होने लगता है परिचय 
फिर उसके अंदर ही बना लेता है पैठ 
तब मज़े से भीतर ही भीतर जीवन रस पीकर
दुःख अपने अंदर से ही पैदा कर देता है कुछ और दुखों  
कमी पड़ती है तो कुछ और दुखों को कर लेता है बहार से आमंत्रित 
सिलसिला तब तक अनवरत चलता रहता है 
जब तक वो व्यक्ति नहीं हो जाता मिट्टी 

तब दुःख बतियाते हैं 
उफ्फ ! कितना बेवफा निकला 
हमने जिसका अंत तक साथ नहीं छोड़ा 
उसने हमारी ज़फ़ा का ये सिला दिया 
चलो छोड़ो इसे 
कोई और ठिकाना ढूँढ़ते हैं 
और उसके आँगन में अपनी महफ़िल सजाते हैं। 

जो ना हो सका



प्रेम 
आदमी के भीतर 

आग सा सुलगा
बादल सा बरसा

फूल सा खिला 
कांटे सा चुभा 

पवन सा चला 
नदी सा बहा

अमृत सा हुआ
विष सा बुझा

बचपन सा मुस्काया 
बुढ़ापे सा रोया 

समंदर सा गहराया
आसमान सा फैला

पक्षी सा उड़ा 
पतंग सा कटा 

विश्वास सा जमा
विश्वासघात सा फटा

सब हुआ किया
फिर भी क्या आदमी सा जिया।

Monday, 14 September 2015

बेशतर के खिलाफ विद्वेष का उदघोष




कुछ  दिन पहले
अपने से बहुत बहुत बेशतर एक कामरेड को
अपने से कमतरों पर अहंकार भरा उपहास  करते देखा था
तब  पहली बार किसी  बेशतर पर
गुस्सा नहीं बहुत बहुत दया आई थी

आखिर क्यों भूल जाते हैं बेशतर 
अपनी बेशी के दम्भ में 
कि हर का वज़ूद है किसी के होने से 
कमतर हैं तो हैं बेशतर


जैसे 
अंधेरे के होने से है रोशनी की हनक 
दुःख ही गढ़ते हैं सुख की परिभाषा 
बुराई तय करती है अच्छाई की सीमा 
गरीबी भोग कर ही समझ में आती है अमीरी 

वे  नहीं जानते  
जिस दिन ख़त्म हो जाएंगे सारे कमतर
उस दिन बहुत से बेशतर भी आ जाएंगे सीमान्त पर
और जब शिनाख़्त होगी बचे बेशतरों में कुछ कमतरों की
और सीमान्त से उनको धकेल दिया जाएगा बाहर 
तब समझ में आएगा एक बेशतर को
क्या होता है किसी बेशतर के लिए दया का उपजना । 

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एक कमतर का प्रलाप 
('प्रलाप 'शब्द शिरीष जी से उधार  )

Tuesday, 25 August 2015

यादें




यादें 
मन के किसी कोने में 
इकठ्ठा होती रहती हैं 
किसी ख़ज़ाने की तरह 
छन से बाहर आती हैं 
किसी कठिन समय में 
और फ़ैल जाती हैं 
मन के आकाश पर 
बचाती है आदमी को स्खलित होने से उस समय में। 

जैसे दुःख से गीले मन में 

कोई याद छन से आती है 
चटक धूप की तरह 
और सोख लेती है सारी आर्द्रता 

जैसे किसी उदास लम्हे में 

इक याद आती है 
फूलों की खुशबू लिए ताज़ा हवा के झोकों की तरह 
और बहा ले जाती है सारी उदासी  

जैसे ज़िंदगी के किसी बदरंग मोड़ पर 

छन से उड़ आती है कोई याद 
सतरंगी इन्द्रधनुष की तरह  
और रंगों से भर देती है दुनिया 

जैसे जेठ माह से गुज़रते जीवन समय में
किसी मीठे सपने की याद
सावन भादों जैसे मेघ बरसकर 
कम कर जाती है ताप  

जैसे कनपटी पर या होठों और गालों पर 
उम्र की सफ़ेद लकीरों के उभरने पर  
छन से पहले क्रश की मीठी सी याद आती है 
किसी खिज़ाब की तरह 
और कर जाती है 
नामुराद सफ़ेद लकीरों को काला 

जैसे चेहरे पर 

पकी उम्र की झुर्रियों के उग आने पर 
छन से पहले प्यार की याद 
छा जाती है चेहरे पर नूर की तरह 
और मिटा देती है सिलवटों का नामोनिशां 

दरअसल यादें भी 
बहन की गुल्लक 
मां के चुटपुटिया बटुए 
और दादी मां की ट्रंक में सहेज कर रखी पोटली की तरह 
गाढ़े समय में  


सबसे विश्वसनीय धरोहर होती हैं। 

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Sunday, 23 August 2015

ये जीवन



ना जाने 
ये कब 
और कैसे हो गया 
कि मुठ्ठी में करते करते आसमां  
आसमां सा जीवन
मुठ्ठी भर रह गया 

करते करते मुठ्ठी में जहाँ 

ये जीवन 
खाली मुठ्ठी सा 
रीत गया।

Thursday, 20 August 2015

इस बरसात




1.
इस बरसात  
तेरी याद में 
कैसा सील गया है मन
घर में रखे सामां की तरह 
बस इक ख्वाइश है 
तेरे दीदार की धूप की। 


2.
इस बरसात 
कम बरसे बादल 
पर तेरी याद में 
खूब बरसे नैना 
बस इतनी सी इल्तिज़ा है मेरी 
तू भी तो एक बार भीग 
यादों की बारिश में। 


3. 

इस बरसात  
तेरी याद में 
धुआँ धुआँ हुआ
सीला मन 
और धीमे धीमे सुलगा 
भीगा तन। 

Friday, 14 August 2015

गाओ सपने













सावधान
खुला छोड़ दो हमारे हिस्से का आसमान
हम आ रहे हैं 
गाने को 
अंधेरों का शोकगीत 
और करने मुनादी 
कि उन्हें पहुँचा दिया है उनके अंजाम तक 
नहीं डरेंगे अब  
कि दुखों के पेड़ से उतर कर बेताल 
आ बैठेगा फिर फिर हमारे कन्धों पर 
अब हम 
ओढ़ कर धूप 
खेलेंगे खुशी 
 गाएंगे सपने 
 नाचेंगे ज़िंदगी ज़िंदगी ज़िंदगी