Thursday, 17 September 2015

कोई और घर ढूँढ़ते हैं



परजीवी
कुछ कीटाणु
कुछ विषाणु
कुछ वनस्पतियां
और एक खास प्रकार की आदमी की प्रजाति ही नहीं होते
सबसे बड़े परजीवी होते हैं हमारे दुःख


दुःख जब एक बार किसी से कर लेता है परिचय जाने अनजाने 
नहीं भूलता जल्द उस को 
पहले कभी कभी मिलना होता है दुःख का उस व्यक्ति से 
धीरे धीरे गाढ़ा होने लगता है परिचय 
फिर उसके अंदर ही बना लेता है पैठ 
तब मज़े से भीतर ही भीतर जीवन रस पीकर
दुःख अपने अंदर से ही पैदा कर देता है कुछ और दुखों  
कमी पड़ती है तो कुछ और दुखों को कर लेता है बहार से आमंत्रित 
सिलसिला तब तक अनवरत चलता रहता है 
जब तक वो व्यक्ति नहीं हो जाता मिट्टी 

तब दुःख बतियाते हैं 
उफ्फ ! कितना बेवफा निकला 
हमने जिसका अंत तक साथ नहीं छोड़ा 
उसने हमारी ज़फ़ा का ये सिला दिया 
चलो छोड़ो इसे 
कोई और ठिकाना ढूँढ़ते हैं 
और उसके आँगन में अपनी महफ़िल सजाते हैं। 

जो ना हो सका



प्रेम 
आदमी के भीतर 

आग सा सुलगा
बादल सा बरसा

फूल सा खिला 
कांटे सा चुभा 

पवन सा चला 
नदी सा बहा

अमृत सा हुआ
विष सा बुझा

बचपन सा मुस्काया 
बुढ़ापे सा रोया 

समंदर सा गहराया
आसमान सा फैला

पक्षी सा उड़ा 
पतंग सा कटा 

विश्वास सा जमा
विश्वासघात सा फटा

सब हुआ किया
फिर भी क्या आदमी सा जिया।

Monday, 14 September 2015

बेशतर के खिलाफ विद्वेष का उदघोष




कुछ  दिन पहले
अपने से बहुत बहुत बेशतर एक कामरेड को
अपने से कमतरों पर अहंकार भरा उपहास  करते देखा था
तब  पहली बार किसी  बेशतर पर
गुस्सा नहीं बहुत बहुत दया आई थी

आखिर क्यों भूल जाते हैं बेशतर 
अपनी बेशी के दम्भ में 
कि हर का वज़ूद है किसी के होने से 
कमतर हैं तो हैं बेशतर


जैसे 
अंधेरे के होने से है रोशनी की हनक 
दुःख ही गढ़ते हैं सुख की परिभाषा 
बुराई तय करती है अच्छाई की सीमा 
गरीबी भोग कर ही समझ में आती है अमीरी 

वे  नहीं जानते  
जिस दिन ख़त्म हो जाएंगे सारे कमतर
उस दिन बहुत से बेशतर भी आ जाएंगे सीमान्त पर
और जब शिनाख़्त होगी बचे बेशतरों में कुछ कमतरों की
और सीमान्त से उनको धकेल दिया जाएगा बाहर 
तब समझ में आएगा एक बेशतर को
क्या होता है किसी बेशतर के लिए दया का उपजना । 

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एक कमतर का प्रलाप 
('प्रलाप 'शब्द शिरीष जी से उधार  )

Tuesday, 25 August 2015

यादें




यादें 
मन के किसी कोने में 
इकठ्ठा होती रहती हैं 
किसी ख़ज़ाने की तरह 
छन से बाहर आती हैं 
किसी कठिन समय में 
और फ़ैल जाती हैं 
मन के आकाश पर 
बचाती है आदमी को स्खलित होने से उस समय में। 

जैसे दुःख से गीले मन में 

कोई याद छन से आती है 
चटक धूप की तरह 
और सोख लेती है सारी आर्द्रता 

जैसे किसी उदास लम्हे में 

इक याद आती है 
फूलों की खुशबू लिए ताज़ा हवा के झोकों की तरह 
और बहा ले जाती है सारी उदासी  

जैसे ज़िंदगी के किसी बदरंग मोड़ पर 

छन से उड़ आती है कोई याद 
सतरंगी इन्द्रधनुष की तरह  
और रंगों से भर देती है दुनिया 

जैसे जेठ माह से गुज़रते जीवन समय में
किसी मीठे सपने की याद
सावन भादों जैसे मेघ बरसकर 
कम कर जाती है ताप  

जैसे कनपटी पर या होठों और गालों पर 
उम्र की सफ़ेद लकीरों के उभरने पर  
छन से पहले क्रश की मीठी सी याद आती है 
किसी खिज़ाब की तरह 
और कर जाती है 
नामुराद सफ़ेद लकीरों को काला 

जैसे चेहरे पर 

पकी उम्र की झुर्रियों के उग आने पर 
छन से पहले प्यार की याद 
छा जाती है चेहरे पर नूर की तरह 
और मिटा देती है सिलवटों का नामोनिशां 

दरअसल यादें भी 
बहन की गुल्लक 
मां के चुटपुटिया बटुए 
और दादी मां की ट्रंक में सहेज कर रखी पोटली की तरह 
गाढ़े समय में  


सबसे विश्वसनीय धरोहर होती हैं। 

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Sunday, 23 August 2015

ये जीवन



ना जाने 
ये कब 
और कैसे हो गया 
कि मुठ्ठी में करते करते आसमां  
आसमां सा जीवन
मुठ्ठी भर रह गया 

करते करते मुठ्ठी में जहाँ 

ये जीवन 
खाली मुठ्ठी सा 
रीत गया।

Thursday, 20 August 2015

इस बरसात




1.
इस बरसात  
तेरी याद में 
कैसा सील गया है मन
घर में रखे सामां की तरह 
बस इक ख्वाइश है 
तेरे दीदार की धूप की। 


2.
इस बरसात 
कम बरसे बादल 
पर तेरी याद में 
खूब बरसे नैना 
बस इतनी सी इल्तिज़ा है मेरी 
तू भी तो एक बार भीग 
यादों की बारिश में। 


3. 

इस बरसात  
तेरी याद में 
धुआँ धुआँ हुआ
सीला मन 
और धीमे धीमे सुलगा 
भीगा तन। 

Friday, 14 August 2015

गाओ सपने













सावधान
खुला छोड़ दो हमारे हिस्से का आसमान
हम आ रहे हैं 
गाने को 
अंधेरों का शोकगीत 
और करने मुनादी 
कि उन्हें पहुँचा दिया है उनके अंजाम तक 
नहीं डरेंगे अब  
कि दुखों के पेड़ से उतर कर बेताल 
आ बैठेगा फिर फिर हमारे कन्धों पर 
अब हम 
ओढ़ कर धूप 
खेलेंगे खुशी 
 गाएंगे सपने 
 नाचेंगे ज़िंदगी ज़िंदगी ज़िंदगी
                                                                                     

Tuesday, 4 August 2015

देह के पार जो दुनिया है



1.
एक अपारदर्शी समय में
जब  सबने अपने को छुपा रखा है कई कई तहों  के भीतर
तुम इतनी पारदर्शी हो
लगता ही नहीं कि तुम देह हो
देह के पार तुमने बसा रखी है एक दुनिया
जो तुम्हारी और सिर्फ तुम्हारी है
दिखाई देती है साफ़ साफ़।

2.

तुम्हारी देह पर सजे हैं जो भी आधे सच और आधे झूठ
उसका पूरा सच और झूठ दिखाई देता है उस पार
तुम्हारे कहे गए हाँ
जो भीतर ना थीं
और तुम्हारी ना
जो भीतर हाँ थे
सब लटके पड़े हैं तुम्हारी देह के उस पार
उल्टे चमगादड़ों की तरह
जो बाहर निकलने की कोशिश में
ध्वनि तरंगों की तरह
लौट लौट आते हैं बार बार
देह से टकरा कर
फिर फिर लटक जाते हैं उल्टे
उसी अंधेरी खोह में
जहां लटकते  आएं हैं सदियों से।

3.

ये जो तुम्हारी देह पर
उदास मुस्कान और बिखरी सी ख़ुशी टंगी हैं
ये भी आधा सच है
पूरा सच उस पार है
जहाँ दुखों का एक पूरा आकाश पसरा पड़ा है
भटकती आत्माओं की तरह दबे कुचले सपने हैं
अतृप्त इच्छाओं के उमड़ते घुमड़ते बादल हैं
 असहमतियों का लहराता अशांत समंदर है
और बग़ावत का ज्वालामुखी बस फटने को है
 देह ने बलात् रोक रखा है आने वाली उस प्रलय को
 जिससे बननी है एक नई सृष्टि

4.

आखिर कब तक देह का बाँध रहेगा
कब तक
तुम्हारा ये बेबस उधार सा
अपना जीवन
जीवन का अपना नहीं बनेगा।

Thursday, 2 July 2015

शीर्षक




सबसे पहले आते हैं अक्षर 
अक्षर गढ़ते हैं शब्द 
शब्द से बनते है वाक्य 
वाक्य बनाते हैं पृष्ठ 
पृष्ठों से बनते हैं अध्याय 
अध्याय मिलकर लेते हैं आकार पुस्तक का 
अचानक आता है एक शीर्षक 
किसी सामंत की तरह 
मिट जाती है सबकी पहचान 
सब जाने जाते हैं उस शीर्षक से।



Monday, 29 June 2015

कबूतर और बहेलिया





बहेलिया पहले डालेगा चुग्गा आश्वासनों का
उसमें मिलाएगा सुनहरे भविष्य के सपनों की अफीम
जब मदहोश हो जाएंगे कबूतर सारे
तो बिछाएगा मजबूत जाल
जिसका एक सूत्र होगा नस्ल का
एक बतियाने की बोली का
एक रहने की डाल का
एक उनके शरीर के रंग का
जो रंगा होगा धर्म और देशभक्ति के गहरे रंगों से
इस बार बहेलिया नहीं खड़ा होगा पेड़ के पीछे
क्योंकि वो जानता है उनके उड़ जाने की बात
बल्कि हाथ में लिए चुग्गा खड़ा होगा कबूतरों के पास
और पेड़ के पीछे होंगे बहेलिए के व्यापारी मित्र
जिनकी गिद्ध दृष्टि टिकी होगी कबूतरों के घोंसलों पर
और भिड़ा रहे होंगे जुगत पेड़ों को कब्जाने की
इस बार नहीं उड़ पाएंगे मदहोश कबूतर
बाई द वे उड़ भी जाएं
तो जाएंगे कहाँ?
चूहे के पास ही ना !
पर वे नहीं जानते कि
चूहा भी मिल चुका है पेड़ के पीछे वाले व्यापारियों से
और खुद भी बन गया है बड़ा बहेलिया
उसके जाल कुतरने वाले दांत हो गए हैं भोथरे
और उसके हाथ लग गया है और भी ज्यादा मदहोशी वाला रसायन
सीख गया है कबूतरों को जाल में फंसाए रखने की जुगत
वो चलाएगा अस्मिता का जादू
नहीं हो पाएंगे आजाद कबूतर
तो मित्रों कहानी थोड़ी बदल गई है
नमूदार हो गए हैं कुछ नए किरदार
बहेलिया सीख गया है कुछ नए दांव पेंच
कबूतर भूल गए हैं कुछ कुछ एकता का पाठ।

Sunday, 7 June 2015

एक कहानी अधूरी सी


क्लासरूम में
कभी ख़त्म ना होने वाली 
हमारी बातों के बीच 
वो अनकहा
और पलास के सिंदूरी दहकते फूलों से लदे पेड़ों के नीचे टहलते हुए
हमारी लम्बी खामोशियों के बीच 
बहुत कुछ कहा गया

सीनेट हाल के कॉरीडोर में तैरती हमारी फुसफुसाहटें

और चबूतरे पर बैठकर गाये गीतों की हमारी गुनगुनाहटें

आनंद भवन के सीढ़ीनुमा लॉन पर 

गूंजती हमारी खिलखिलाहटों से
मिलकर बनी 

गुलाब के अनगिनत रंगों की मौज़ूदगी में

अनजाने लोगों के होठों पर तैरती रहस्यमयी मुस्कान
और उनकी आँखों की चमक से
साहस पाती हमारी कहानी

बन चुकी थी प्रतिरोध का दस्तावेज

जिसे जाना था संगम की ओर
मिलन के लिए
पर पता नहीं
क्या हुआ
क्यों बहक गए तुम्हारे कदम 
और चल पड़े कंपनी बाग़ की तरफ
जहाँ ब्रिटेन की महारानी की तरह
तुम्हें करनी थी घोषणा
एक युग के अंत की
ताकि साध सको तिज़ारत का बड़ा मुक़ाम।


Monday, 1 June 2015

मुखौटा



बताओ तो ज़रा
कैसे बिना कोई शिकन लिए चहरे पर
बने रहते हो इतने बड़े कलाकार
कि गरीब की थाली में परोसकर कुछ आश्वासन
छीन लेते हो उसके मुँह का कौर
और वादों का झुनझुना पकड़ाकर
कर लेते हो मासूम सपनों को 
अपनी तिज़ोरी में कैद 

बताओ तो ज़रा

'एकता' के नारे डालकर मज़दूर की झोली में  
कैसे उसकी बिछावन को
बना लेते हो अपने पैरों के नीचे की रेड कार्पेट
कैसे किसान में 'अन्नदाता' होने का सब्ज़बाग़ जगाकर
उसकी  हाड़तोड़ मेहनत के अन्न को  
बदल देते हो अपनी रंगीन शाम के 'चखना' में 


कुछ तो खुलो

बताओ तो ज़रा
कैसे खून के लाल रंग को
हरे भूरे नीले सुफ़ेद रंग में बदल कर 
कर देते हो रंग बिरंगा
और उससे लगी आग के धुँए से कर देते हो पूरे आसमां को स्याह
आखिर कैसे आदमी के दुखों को बना लेते हो
अपने बेहया सुखों का तकिया
और बनकर तीन बंदर
बजाते हो चैन की बंशी।

कुछ तो बताओ

कैसे आदमी के भीतर सुलग रही आग को
अपनी धूर्तता भरी आवाज़ से साधकर
 बना लेते हो अपनी ताकत तथा 
अपनी अय्याश सत्ता की नींव। 


कुछ तो गिरह खोलो और बोलो 

कुछ तो पता चलने दो 
आदमी से सत्ताधारी मठाधीश बनने के 
अनिर्वचनीय सुख' वाले तिलिस्मी सफ़र का 
ताकि कोशिश हो सके इस तिलिस्म से बचाने की 
आने वाली नस्लों को। 

Thursday, 28 May 2015

शब्द रोटी नहीं है





ये समय है शब्दों की सत्ता का

शब्द हैं आग और पानी एक साथ 

शब्द हैं प्यार और घृणा 

शब्द हैं शांति और हिंसा
शब्द हैं उम्मीद और नाउम्मीदी 
शब्द है  विनाश और विकास

शब्द हो सकते हैं कोरे आश्वासन

या झूठी दिलासा 
 शब्द वायदे भी हैं
और हैं बहाने भी
वैसे तो शब्द हैं हर हक़ीक़त ज़िंदगी की 
फिर भी एक सीमा पर आकर ठिठक जाती है उसकी सत्ता 
दरअसल शब्द नहीं बन सकते रोटी 
शब्दों से नहीं भरते पेट
वे नहीं बुझा सकते
पेट की आग !

Tuesday, 7 April 2015

बेटी का होना


एक 

जैसे सूरज के होने से 

दिन का होना 
रात होने से 
होना चाँद सितारों का 

जैसे आकाश के होने से 

विस्तार का होना 
सागर होने से  
होना गहराई का 

जैसे बसंत के होने से 

कूकना कोयल का 
सावन होने से 
झूलों का पड़ना 

जैसे साँसों के होने से 

जीवन का चलना 
तेरे होने से 
होना मेरा। 


दो 


तेरा हँसना 

सर्द में धूप का खिलना 

तेरा मुस्कराना 

रात में चांदनी का फैलना 

तेरा स्पर्श 

सारी खुशियों का दामन में सिमट आना  

तेरा रोना 

सावन में फुहार का गिरना 

तेरा रूठना 

आसमान में बादलों का घिरना 

तेरा बोलना 

राग मल्हार को सुनना 

और तेरा होना 

जीवन में अर्थ का होना। 



तीन 



तेरा होना 

मन में आशंकाओं का घुमड़ना 

तेरा होना 

माथे पे चिंता की लकीरों का खिंचना 

तेरा होना 

दहेज़ का बंधक होना 

तेरा होना 

जल कर मरने की खबरों का होना 

तेरा होना 

15 /12 का होना 

तेरा होना 

मन में डर के दरिया का बहना। 


चार



तेरा होना 

सरोज स्मृति का लिखा जाना 

















Monday, 16 March 2015

ज़िंदगी




पल-पल कटती जाती
रफ्ता-रफ्ता बीतती जाती
बेसाख़्ता तमाम होती जाती
बस यूँ ही गुज़रती जाती

इस होते जाने में

गर कुछ नहीं होता
तो बस यही
कि ज़िंदगी जी नहीं जाती। 

Wednesday, 28 January 2015

अंदर का आदमी



रोज़ सुबह  मन में बहती है एक नदी
उगता है एक पेड़
चहचहाती हैं चिड़ियाँ
कई सारे जानवर भी हो जाते है सक्रिय
पर इनकी सुगबुगाहट से जाग जाता है दिमाग में सोया आदमी
चिड़चिड़ाता है
पसंद नहीं  ये सब उसे
वो  करने लगता है विचार
धीरे धीरे बढ़ता  जाता है ताप उसके विचारों का
तब सूख जाती है नदी
झुलस जाते है पेड़
भाग  खड़े होते है सारे पशु पक्षी
रोज़ ऐसे ही जीतता  जाता है अंदर का आदमी
लंबा होता जाता है इंतज़ार
कि कब हारेगा ये आदमी
कल कल बहेगी नदी
हरियाएगा पेड़
चहकेगे पक्षी
पूरी शिद्दत से सक्रिय होंगे जानवर
और मैं बन जाऊंगा आदमी।



Tuesday, 23 December 2014

एहसास


तेरी सांसें
सर्द रातों में
शोला बन
देह में कुछ पिघलाती रहीं

तेरी छुअन

तपती दोपहर में भी
बर्फ़ की मानिंद
मन में कुछ जमाती रही

ज़िंदगी बस यूँ ही

पिघलते और जमते
रफ्ता रफ्ता गुज़रती गई। 



Sunday, 19 October 2014

पत्थर



तुम  वैसे बिल्कुल नहीं हो 

जैसे कहे 
और समझे जाते हो। 

मैं जानता हूँ 

जब तुम प्रेम में पगते हो 
तो ताजमहल बन जाते हो  
करुणा में भीगते हो 
तो दरिया बन बह निकलते हो  
दुःख से गलते हो 
तो शिवाला बन बैठते हो 
मिटने पर आते हो 
तो रेत बन जाते हो
चक्की का पाट बन 
पेट थपथपाते हो
सिल बट्टा बन 
नथुने महकाते  हो
ख़ुद की रगड़ से घायल होकर भी
दुनिया को रोशन करते हो 
अपने सीने पर 
खुदवाते हो राजाज्ञाएं 
और फिर सदियों तक ढ़ोते हो 

ये सब अच्छा है 

बस एक खराबी है  तुम्हारी 
कि तुम खौलना और धधकना भी  जानते हो 
और अक्सर मज़लूमों के हाथ के 
हथियार बन जाते  हो 
तुम्हारा यूँ धधकना इन्हें पसंद नहीं 
कि तुम्हारे ताप से पिघलने का 
ख़तरा  है उनकी  काँच की दीवारों को  
कि दीवारों के पीछे के उनके अंधेरों पर 
हावी हो सकती है
तुम्हारे ताप की रोशनी 
दरक सकती है उनकी सत्ता।  

इसीलिए तुम हो 

बेकार 
जड़ 
और कठोर भी
आज तक।  


Monday, 8 September 2014

इलाहाबाद ज्ञानरंजन की नज़र में

         

        सुप्रसिद्ध कथाकार ज्ञानरंजन कल इलाहाबाद में थे। मीरा स्मृति सम्मान के सिलसिले में। मैं उन्हें एक बड़े कथाकार के रूप में जानता हूँ और उससे भी अधिक पहल के संपादक के रूप में। इलाहाबाद में रहते हुए ज्ञानरंजन,रविन्द्र कालिया और दूधनाथ की त्रयी के बारे में काफी कुछ सुना था।कल उनसे मिलने और उन्हें सुनने का मौका मिला। सम्मान समारोह में उन्होंने एक छोटा सा वक्तव्य दिया। दरअसल वे इलाहाबाद के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त कर रहे थे। वे उस शहर को ढूंढने का प्रयास कर रहे थे जिसमें उनका जन्म हुआ और पले बढ़े और जिसे वे वर्षों पहले छोड़ गए थे। जिसका उन पर बड़ा दाय है और जिसे वे शिद्दत से महसूस भी करते हैं। उन्होंने शहर को और शहर ने उन्हें भरपूर जिया। तभी तो इतने वर्षों से इलाहाबाद की स्मृतियाँ उनके मन में इस तरह जड़ थी मानो वो लंबा अंतराल कल की बात हो। वे अपने जिए उस इलाहाबाद के शानदार और सजीव चित्र बनाते हैं जो उनकी स्मृति पटल पर स्थायी रूप से अंकित हो चुका है और जो भगवती चरण वर्मा,दूधनाथ सिंह,नासिरा शर्मा,धर्मवीर भारती में बार बार आता है। पर वो शहर अब उन्हें ढूंढे से भी नहीं मिलता। तभी वे उसकी दुखी मन से उसकी मृत्यु की घोषणा करते है। पर शहर मन में इतने गहरा पैठा है, वे इस शिद्दत से उसे चाहते हैं कि उसकी मृत्यु में भी खूबसूरती ढूंढ लेते हैं। वे मानते हैं कि अपनी मृत्यु के बाद भी ये शहर तक्षशिला,नालंदा या एथेंस जैसा ही खूबसूरत लगेगा। उनके वक्तव्य के कुछ संपादित अंश .……

                                   "जिस  इलाहाबाद में मैंने अपने को आवारागर्द के रूप में पाया,जिस इलाहाबाद में एक संभ्रांत परिवार में जन्म लेकर भी मैं अभिजात्यों के खिलाफ चला गया और अपनी हर भाषाओं से इसकी निरंतर मुख़ालफ़त की। यहाँ तक की कहानियों के उन पात्रों की भी जो इलाहाबाद की उपज थे और जो उपज अब पूरे मुल्क में फ़ैल गयी है  ………   इलाहाबाद ने मुझे शरण दी है,स्वीकार किया है और अब सम्मान भी किया है तो अब अधिक बद्तमीजी नहीं करूँगा।  इलाहाबाद का तो जलवा था कि मुझे नौकरी भी बिना साक्षात्कार के मिली।उन दिनों लोग जबलपुर में मुझसे सम्मानजनक दूरी रखते थे कि मैं इलाहाबाद का हूँ,इलाहाबाद से आया हूं।  नई नौकरी के बावज़ूद मैं  हरीशंकर परसाई के साथ अनाप शनाप छुट्टियां लेता हुआ,जब मुक्तिबोध कैंसर से जूझ रहे थे तो राजनांदगांव,भोपाल,दिल्ली के अस्पतालों के चक्कर लगाता रहा और वहां मेरी मुलाकातें शमशेर,नेमिचन्द्र जैन, श्रीकांत वर्मा से बार बार हुईं। ना जाने कितनी महापुरुषों की छायाएं इसी इलाहाबाद में मेरे ऊपर गिरी उसे बताना कठिन है। इसलिए इलाहाबाद के असंख्य आभार हैं। साथियों विश्वास करें जब इलाहाबाद की बात आती है तो मेरा सोना-जागना स्थगित हो जाता है। मेरे अंदर एक युवक उभरता है।  भीतर रासायनिक बेकरारी होने लगती है। पुराना उत्साह उत्पात तोड़ फोड़  मचने लगती है।  इसलिए मैं वाचाल होने के लिए क्षमा चाहता हूँ। .......
             जीते जी मैंने कम से कम दो इलाहाबाद देखे। मैं पुराने का ध्वंसावशेष हूँ   और मलबे का अंकुर भी।
  पुरानी जगहों को खोज रहा हूँ पर उनका कायाकल्प हो गया है। मैं जानना चाहता कि एक शहर कब और कैसे   मरता और कैसे जीता है। मेरे कोई भी पात्र आउटसाइडर नहीं हैं। सभी इस भूगोल के हैं। मेरा लोकेल भी इलाहाबाद है। और इन पात्रों से मेरी वैचारिक लड़ाई आज भी जारी है। आप सब को अपनी कुछ नकारमक बातें बतलाता हूँ।एक तो ये कि इलाहाबाद का आदमी सदा क्षम्य है।  दूसरा यह  इलाहाबाद का आसमान ज़मीन सब अलग है। और अंतिम यह कि हम सब ने इलाहाबाद का दूध पिया है। बहरहाल मैंने इस शहर में महान अध्यापक प्राप्त किए,ऐसे  नए पुराने लेखक कलाकार संपादक जिन्हें मैंने तारामंडल कहा। ऐसे दूधनाथ,कालिया, लक्ष्मीधर, प्रभात,ओमप्रकाश, रज्जू और नीलाभ जैसे मित्र जिनके उजाले अंधेरों में मेरा जुगनू दमकता रहा। यहीं कौशल्या जी ममताजी और सुलक्षणा ने असंख्य बार खाना  खिलाया।मेरे मित्र झूंसी ,तेलियरगंज ,धूमनगंज  और दिल्ली में फेंक दिए गए। हर शहर में ये होता रहा है और हो रहा है। शानी ने दिल्ली पर लिखा 'सारे दुखिया जमुना पार'। मैं कहूँगा  गंगा पार,जमुना पार और बचे खुचे चौफटका पार। …… तो मेरे गुरु, मेरे दोस्त, मेरे पात्र, मेरे साथी, मेरे लेखक, मेरे अड्डे,  मेरे फुटपाथ, यहां तक कि मेरी प्रेमिका और फिर मेरी पत्नी सभी इसी शहर के पात्र हैं। मैं उन्हें नागरिक नहीं पात्र कहता हूँ क्योंकि उन्हीं से मेरी रचना पैदा हुई है। जिस सभागार में हम उपस्थित हैं उससे कुछ दूरी पर पोनप्पा रोड़ है। जहाँ हुड्ड हो जाने के बाद मैंने सायकिल सीखी और इनाम में सौ रुपए पाए क्योंकि मेरे लोग यह उम्मीद छोड़ चुके थे। साउथ रोड की मरीन ड्राइव की तरह लहराती कटावदार बत्तियां दूधनाथ की कहानी में हैं ,ज़ीरो रोड को नासिरा शर्मा ने आबाद किया और भगवती बाबू के उपन्यास में रास्ते राहत जगाती  यूनिवर्सिटी रोड बार बार आता है और वो शानदार गोल केथेड्रल जिसने धर्मवीर भारती को प्रेरित किया और वे अंधायुग तक गए। इसी इलाके में महादेवी  सबसे पास थीं पर वे सदा सबसे दूर रहीं। यहाँ से अमृत राय भी पास थे और श्रीपत राय  सानु सन्यासी ड्रूमंड रोड पर। बहुत बाद में इसी इलाके में अमरकांत भी आए ,मार्कण्डेय ,ओंकार शरद राजापुर  सिमेट्री के पास बसे  थे। आकाशवाणी के दो जुड़वां  बंगले भी इस सभागार के पास हैं  जहाँ एक समय गिरिजा कुमार माथुर कभी कभार एक टाँगे पर दारागंज तक जाते थे। तांगा रस्तोगी जी का था। उनके साथ इस आवारा को दो चार बार संगत करने का अवसर मिला। यहीं भारत भूषण अग्रवाल और प्रभाकर माचवे भी थे जिन्होंने मुझे तीन सप्ताह के तीन अनुबंध दिए थे जिसकी मज़दूरी  उन दिनों कुल पंद्रह रुपये थी। यहीं स्टूडियो में मैंने उस्ताद अलाउद्दीनखां के सरोद को खिलखिलाते और सरोद पर उस्ताद को आंसू टपकाते भी देखा था। यहीं मैंने पहली बार  प्रभात के साथ मुक्तिबोध की गौरांगउटान कविता का पाठ भी सुना। उन दिनों इलाहाबाद का ये इलाका दबंग, अभिजात्य अंग्रेजी शिल्प और सुनसान से भरा ऐसा इलाका था जहाँ कोई बूढ़ी औरत सीताफल नहीं बेच सकती थी। और मूंगफली के ठेले भी इधर नहीं घुसते थे। यह थी पच्छिम की थॉर्नहिल रोड।
          नगरों की एक आयु होती है, वे कितने ही गर्वीले और शरीफ क्यों न हों। ध्यानस्थ हो सौ वर्ष पहले और सौ वर्ष बाद के इलाहाबाद के दृश्य देखे जा सकते हैं। क्योंकि हमारे देश में विकास का जो दर्शन उभरा है और जिस पर एक सीमा तक सहमति भी हो गयी है उसी में ध्वंस, डूब और विनाश निहित हो गया है।जो नगर जल प्लावन, युद्ध, भूकम्प, आवागमन, निष्क्रमण तथा प्रजनन और विकास के अनन्य बहानों की वजह से जमींदोज़ हुए उनमें   सात आठ सौ सालों में गणना सौ के पार हो जाएगी। इनमें जीवित मरे हुए भी शामिल हैं। हमारे देखते देखते विकास ने टिहरी और हरसूद को निगल लिया।  अभी पचास सालों में और नगर तबाह  होने की प्रतीक्षा में हैं। ये शहर नहीं सभ्यताएं थीं। मैं इलाहाबाद के घमंड को टूटते हुए देख रहा हूँ। इसके गर्वीले चिन्ह और लैंडमार्क मिट रहे हैं। लेकिन सुन्दर और मरी हुई चीज़ें भी  शानदार हो सकती हैं। नालंदा, तक्षशिला, मोहनजोदड़ों,कौशाम्बी, एथेंस  की याद कर लें। सूची और भी है। इलाहाबाद वयोवृद्ध है या उन्मत्त   या हत्यारों द्वारा मारा जाएगा या क्या पता नदियां इसे घेर लेंगी। मेरी यह समझ है इलाहाबाद पर हमला हो चुका है। ये हमले पुणे, हैदराबाद, बेंगलुरु, लखनऊ,  दिल्ली और अहमदाबाद पर भी हो चुके हैं।  एक अदृश्य दीवार खड़ी हो गयी है जो नए पुराने शहरों के बीच है। हमारे जैसे लोग नए पुराने किसी भी हिस्से में चैन से नहीं रह सकते। इस आर्थिक और सांस्कृतिक बलवे का अंजाम कहाँ तक जाएगा यह सब जानना पहचानना हमारे लिए दिलचस्प है। सवाल मरने जीने का नहीं है। सवाल इसके आगे का है। शहर में सामग्रियाँ,तरल मुद्रा,चमक दमक,भुलक्कड़ी,जन संकुलता किसी की भी कोई कमी नहीं है।फिर भी सवाल खतरनाक होते जा रहे हैं।  इस सम्मान कार्यक्रम में मैं संकेत देना चाहता हूँ कि इलाहाबाद पर एक किताब चल रही है। यह वक्तव्य केवल कृतज्ञता मात्र है। इलाहाबाद  के कारण मुझे आज भी बोनस मिल रहा है।" 





हवा बदल गई है



हवा बदल गई है 
अब हवाएँ ज़हरीली हो गई हैं 
धुआं हवाओं को धमकाता है 
फ़िज़ाओं में ज़हर मत घोलों 
हवाएँ स्तब्ध हैं 
निस्पंद हैं 
जिससे एक निर्वात पैदा हो गया है 
और उसमें सब ऊपर नीचे हो रहे हैं 
बिना पेंदी के।