Monday, 29 June 2015

कबूतर और बहेलिया





बहेलिया पहले डालेगा चुग्गा आश्वासनों का
उसमें मिलाएगा सुनहरे भविष्य के सपनों की अफीम
जब मदहोश हो जाएंगे कबूतर सारे
तो बिछाएगा मजबूत जाल
जिसका एक सूत्र होगा नस्ल का
एक बतियाने की बोली का
एक रहने की डाल का
एक उनके शरीर के रंग का
जो रंगा होगा धर्म और देशभक्ति के गहरे रंगों से
इस बार बहेलिया नहीं खड़ा होगा पेड़ के पीछे
क्योंकि वो जानता है उनके उड़ जाने की बात
बल्कि हाथ में लिए चुग्गा खड़ा होगा कबूतरों के पास
और पेड़ के पीछे होंगे बहेलिए के व्यापारी मित्र
जिनकी गिद्ध दृष्टि टिकी होगी कबूतरों के घोंसलों पर
और भिड़ा रहे होंगे जुगत पेड़ों को कब्जाने की
इस बार नहीं उड़ पाएंगे मदहोश कबूतर
बाई द वे उड़ भी जाएं
तो जाएंगे कहाँ?
चूहे के पास ही ना !
पर वे नहीं जानते कि
चूहा भी मिल चुका है पेड़ के पीछे वाले व्यापारियों से
और खुद भी बन गया है बड़ा बहेलिया
उसके जाल कुतरने वाले दांत हो गए हैं भोथरे
और उसके हाथ लग गया है और भी ज्यादा मदहोशी वाला रसायन
सीख गया है कबूतरों को जाल में फंसाए रखने की जुगत
वो चलाएगा अस्मिता का जादू
नहीं हो पाएंगे आजाद कबूतर
तो मित्रों कहानी थोड़ी बदल गई है
नमूदार हो गए हैं कुछ नए किरदार
बहेलिया सीख गया है कुछ नए दांव पेंच
कबूतर भूल गए हैं कुछ कुछ एकता का पाठ।

Sunday, 7 June 2015

एक कहानी अधूरी सी


क्लासरूम में
कभी ख़त्म ना होने वाली 
हमारी बातों के बीच 
वो अनकहा
और पलास के सिंदूरी दहकते फूलों से लदे पेड़ों के नीचे टहलते हुए
हमारी लम्बी खामोशियों के बीच 
बहुत कुछ कहा गया

सीनेट हाल के कॉरीडोर में तैरती हमारी फुसफुसाहटें

और चबूतरे पर बैठकर गाये गीतों की हमारी गुनगुनाहटें

आनंद भवन के सीढ़ीनुमा लॉन पर 

गूंजती हमारी खिलखिलाहटों से
मिलकर बनी 

गुलाब के अनगिनत रंगों की मौज़ूदगी में

अनजाने लोगों के होठों पर तैरती रहस्यमयी मुस्कान
और उनकी आँखों की चमक से
साहस पाती हमारी कहानी

बन चुकी थी प्रतिरोध का दस्तावेज

जिसे जाना था संगम की ओर
मिलन के लिए
पर पता नहीं
क्या हुआ
क्यों बहक गए तुम्हारे कदम 
और चल पड़े कंपनी बाग़ की तरफ
जहाँ ब्रिटेन की महारानी की तरह
तुम्हें करनी थी घोषणा
एक युग के अंत की
ताकि साध सको तिज़ारत का बड़ा मुक़ाम।


Monday, 1 June 2015

मुखौटा



बताओ तो ज़रा
कैसे बिना कोई शिकन लिए चहरे पर
बने रहते हो इतने बड़े कलाकार
कि गरीब की थाली में परोसकर कुछ आश्वासन
छीन लेते हो उसके मुँह का कौर
और वादों का झुनझुना पकड़ाकर
कर लेते हो मासूम सपनों को 
अपनी तिज़ोरी में कैद 

बताओ तो ज़रा

'एकता' के नारे डालकर मज़दूर की झोली में  
कैसे उसकी बिछावन को
बना लेते हो अपने पैरों के नीचे की रेड कार्पेट
कैसे किसान में 'अन्नदाता' होने का सब्ज़बाग़ जगाकर
उसकी  हाड़तोड़ मेहनत के अन्न को  
बदल देते हो अपनी रंगीन शाम के 'चखना' में 


कुछ तो खुलो

बताओ तो ज़रा
कैसे खून के लाल रंग को
हरे भूरे नीले सुफ़ेद रंग में बदल कर 
कर देते हो रंग बिरंगा
और उससे लगी आग के धुँए से कर देते हो पूरे आसमां को स्याह
आखिर कैसे आदमी के दुखों को बना लेते हो
अपने बेहया सुखों का तकिया
और बनकर तीन बंदर
बजाते हो चैन की बंशी।

कुछ तो बताओ

कैसे आदमी के भीतर सुलग रही आग को
अपनी धूर्तता भरी आवाज़ से साधकर
 बना लेते हो अपनी ताकत तथा 
अपनी अय्याश सत्ता की नींव। 


कुछ तो गिरह खोलो और बोलो 

कुछ तो पता चलने दो 
आदमी से सत्ताधारी मठाधीश बनने के 
अनिर्वचनीय सुख' वाले तिलिस्मी सफ़र का 
ताकि कोशिश हो सके इस तिलिस्म से बचाने की 
आने वाली नस्लों को। 

Thursday, 28 May 2015

शब्द रोटी नहीं है





ये समय है शब्दों की सत्ता का

शब्द हैं आग और पानी एक साथ 

शब्द हैं प्यार और घृणा 

शब्द हैं शांति और हिंसा
शब्द हैं उम्मीद और नाउम्मीदी 
शब्द है  विनाश और विकास

शब्द हो सकते हैं कोरे आश्वासन

या झूठी दिलासा 
 शब्द वायदे भी हैं
और हैं बहाने भी
वैसे तो शब्द हैं हर हक़ीक़त ज़िंदगी की 
फिर भी एक सीमा पर आकर ठिठक जाती है उसकी सत्ता 
दरअसल शब्द नहीं बन सकते रोटी 
शब्दों से नहीं भरते पेट
वे नहीं बुझा सकते
पेट की आग !

Tuesday, 7 April 2015

बेटी का होना


एक 

जैसे सूरज के होने से 

दिन का होना 
रात होने से 
होना चाँद सितारों का 

जैसे आकाश के होने से 

विस्तार का होना 
सागर होने से  
होना गहराई का 

जैसे बसंत के होने से 

कूकना कोयल का 
सावन होने से 
झूलों का पड़ना 

जैसे साँसों के होने से 

जीवन का चलना 
तेरे होने से 
होना मेरा। 


दो 


तेरा हँसना 

सर्द में धूप का खिलना 

तेरा मुस्कराना 

रात में चांदनी का फैलना 

तेरा स्पर्श 

सारी खुशियों का दामन में सिमट आना  

तेरा रोना 

सावन में फुहार का गिरना 

तेरा रूठना 

आसमान में बादलों का घिरना 

तेरा बोलना 

राग मल्हार को सुनना 

और तेरा होना 

जीवन में अर्थ का होना। 



तीन 



तेरा होना 

मन में आशंकाओं का घुमड़ना 

तेरा होना 

माथे पे चिंता की लकीरों का खिंचना 

तेरा होना 

दहेज़ का बंधक होना 

तेरा होना 

जल कर मरने की खबरों का होना 

तेरा होना 

15 /12 का होना 

तेरा होना 

मन में डर के दरिया का बहना। 


चार



तेरा होना 

सरोज स्मृति का लिखा जाना 

















Monday, 16 March 2015

ज़िंदगी




पल-पल कटती जाती
रफ्ता-रफ्ता बीतती जाती
बेसाख़्ता तमाम होती जाती
बस यूँ ही गुज़रती जाती

इस होते जाने में

गर कुछ नहीं होता
तो बस यही
कि ज़िंदगी जी नहीं जाती। 

Wednesday, 28 January 2015

अंदर का आदमी



रोज़ सुबह  मन में बहती है एक नदी
उगता है एक पेड़
चहचहाती हैं चिड़ियाँ
कई सारे जानवर भी हो जाते है सक्रिय
पर इनकी सुगबुगाहट से जाग जाता है दिमाग में सोया आदमी
चिड़चिड़ाता है
पसंद नहीं  ये सब उसे
वो  करने लगता है विचार
धीरे धीरे बढ़ता  जाता है ताप उसके विचारों का
तब सूख जाती है नदी
झुलस जाते है पेड़
भाग  खड़े होते है सारे पशु पक्षी
रोज़ ऐसे ही जीतता  जाता है अंदर का आदमी
लंबा होता जाता है इंतज़ार
कि कब हारेगा ये आदमी
कल कल बहेगी नदी
हरियाएगा पेड़
चहकेगे पक्षी
पूरी शिद्दत से सक्रिय होंगे जानवर
और मैं बन जाऊंगा आदमी।



Tuesday, 23 December 2014

एहसास


तेरी सांसें
सर्द रातों में
शोला बन
देह में कुछ पिघलाती रहीं

तेरी छुअन

तपती दोपहर में भी
बर्फ़ की मानिंद
मन में कुछ जमाती रही

ज़िंदगी बस यूँ ही

पिघलते और जमते
रफ्ता रफ्ता गुज़रती गई। 



Sunday, 19 October 2014

पत्थर



तुम  वैसे बिल्कुल नहीं हो 

जैसे कहे 
और समझे जाते हो। 

मैं जानता हूँ 

जब तुम प्रेम में पगते हो 
तो ताजमहल बन जाते हो  
करुणा में भीगते हो 
तो दरिया बन बह निकलते हो  
दुःख से गलते हो 
तो शिवाला बन बैठते हो 
मिटने पर आते हो 
तो रेत बन जाते हो
चक्की का पाट बन 
पेट थपथपाते हो
सिल बट्टा बन 
नथुने महकाते  हो
ख़ुद की रगड़ से घायल होकर भी
दुनिया को रोशन करते हो 
अपने सीने पर 
खुदवाते हो राजाज्ञाएं 
और फिर सदियों तक ढ़ोते हो 

ये सब अच्छा है 

बस एक खराबी है  तुम्हारी 
कि तुम खौलना और धधकना भी  जानते हो 
और अक्सर मज़लूमों के हाथ के 
हथियार बन जाते  हो 
तुम्हारा यूँ धधकना इन्हें पसंद नहीं 
कि तुम्हारे ताप से पिघलने का 
ख़तरा  है उनकी  काँच की दीवारों को  
कि दीवारों के पीछे के उनके अंधेरों पर 
हावी हो सकती है
तुम्हारे ताप की रोशनी 
दरक सकती है उनकी सत्ता।  

इसीलिए तुम हो 

बेकार 
जड़ 
और कठोर भी
आज तक।  


Monday, 8 September 2014

इलाहाबाद ज्ञानरंजन की नज़र में

         

        सुप्रसिद्ध कथाकार ज्ञानरंजन कल इलाहाबाद में थे। मीरा स्मृति सम्मान के सिलसिले में। मैं उन्हें एक बड़े कथाकार के रूप में जानता हूँ और उससे भी अधिक पहल के संपादक के रूप में। इलाहाबाद में रहते हुए ज्ञानरंजन,रविन्द्र कालिया और दूधनाथ की त्रयी के बारे में काफी कुछ सुना था।कल उनसे मिलने और उन्हें सुनने का मौका मिला। सम्मान समारोह में उन्होंने एक छोटा सा वक्तव्य दिया। दरअसल वे इलाहाबाद के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त कर रहे थे। वे उस शहर को ढूंढने का प्रयास कर रहे थे जिसमें उनका जन्म हुआ और पले बढ़े और जिसे वे वर्षों पहले छोड़ गए थे। जिसका उन पर बड़ा दाय है और जिसे वे शिद्दत से महसूस भी करते हैं। उन्होंने शहर को और शहर ने उन्हें भरपूर जिया। तभी तो इतने वर्षों से इलाहाबाद की स्मृतियाँ उनके मन में इस तरह जड़ थी मानो वो लंबा अंतराल कल की बात हो। वे अपने जिए उस इलाहाबाद के शानदार और सजीव चित्र बनाते हैं जो उनकी स्मृति पटल पर स्थायी रूप से अंकित हो चुका है और जो भगवती चरण वर्मा,दूधनाथ सिंह,नासिरा शर्मा,धर्मवीर भारती में बार बार आता है। पर वो शहर अब उन्हें ढूंढे से भी नहीं मिलता। तभी वे उसकी दुखी मन से उसकी मृत्यु की घोषणा करते है। पर शहर मन में इतने गहरा पैठा है, वे इस शिद्दत से उसे चाहते हैं कि उसकी मृत्यु में भी खूबसूरती ढूंढ लेते हैं। वे मानते हैं कि अपनी मृत्यु के बाद भी ये शहर तक्षशिला,नालंदा या एथेंस जैसा ही खूबसूरत लगेगा। उनके वक्तव्य के कुछ संपादित अंश .……

                                   "जिस  इलाहाबाद में मैंने अपने को आवारागर्द के रूप में पाया,जिस इलाहाबाद में एक संभ्रांत परिवार में जन्म लेकर भी मैं अभिजात्यों के खिलाफ चला गया और अपनी हर भाषाओं से इसकी निरंतर मुख़ालफ़त की। यहाँ तक की कहानियों के उन पात्रों की भी जो इलाहाबाद की उपज थे और जो उपज अब पूरे मुल्क में फ़ैल गयी है  ………   इलाहाबाद ने मुझे शरण दी है,स्वीकार किया है और अब सम्मान भी किया है तो अब अधिक बद्तमीजी नहीं करूँगा।  इलाहाबाद का तो जलवा था कि मुझे नौकरी भी बिना साक्षात्कार के मिली।उन दिनों लोग जबलपुर में मुझसे सम्मानजनक दूरी रखते थे कि मैं इलाहाबाद का हूँ,इलाहाबाद से आया हूं।  नई नौकरी के बावज़ूद मैं  हरीशंकर परसाई के साथ अनाप शनाप छुट्टियां लेता हुआ,जब मुक्तिबोध कैंसर से जूझ रहे थे तो राजनांदगांव,भोपाल,दिल्ली के अस्पतालों के चक्कर लगाता रहा और वहां मेरी मुलाकातें शमशेर,नेमिचन्द्र जैन, श्रीकांत वर्मा से बार बार हुईं। ना जाने कितनी महापुरुषों की छायाएं इसी इलाहाबाद में मेरे ऊपर गिरी उसे बताना कठिन है। इसलिए इलाहाबाद के असंख्य आभार हैं। साथियों विश्वास करें जब इलाहाबाद की बात आती है तो मेरा सोना-जागना स्थगित हो जाता है। मेरे अंदर एक युवक उभरता है।  भीतर रासायनिक बेकरारी होने लगती है। पुराना उत्साह उत्पात तोड़ फोड़  मचने लगती है।  इसलिए मैं वाचाल होने के लिए क्षमा चाहता हूँ। .......
             जीते जी मैंने कम से कम दो इलाहाबाद देखे। मैं पुराने का ध्वंसावशेष हूँ   और मलबे का अंकुर भी।
  पुरानी जगहों को खोज रहा हूँ पर उनका कायाकल्प हो गया है। मैं जानना चाहता कि एक शहर कब और कैसे   मरता और कैसे जीता है। मेरे कोई भी पात्र आउटसाइडर नहीं हैं। सभी इस भूगोल के हैं। मेरा लोकेल भी इलाहाबाद है। और इन पात्रों से मेरी वैचारिक लड़ाई आज भी जारी है। आप सब को अपनी कुछ नकारमक बातें बतलाता हूँ।एक तो ये कि इलाहाबाद का आदमी सदा क्षम्य है।  दूसरा यह  इलाहाबाद का आसमान ज़मीन सब अलग है। और अंतिम यह कि हम सब ने इलाहाबाद का दूध पिया है। बहरहाल मैंने इस शहर में महान अध्यापक प्राप्त किए,ऐसे  नए पुराने लेखक कलाकार संपादक जिन्हें मैंने तारामंडल कहा। ऐसे दूधनाथ,कालिया, लक्ष्मीधर, प्रभात,ओमप्रकाश, रज्जू और नीलाभ जैसे मित्र जिनके उजाले अंधेरों में मेरा जुगनू दमकता रहा। यहीं कौशल्या जी ममताजी और सुलक्षणा ने असंख्य बार खाना  खिलाया।मेरे मित्र झूंसी ,तेलियरगंज ,धूमनगंज  और दिल्ली में फेंक दिए गए। हर शहर में ये होता रहा है और हो रहा है। शानी ने दिल्ली पर लिखा 'सारे दुखिया जमुना पार'। मैं कहूँगा  गंगा पार,जमुना पार और बचे खुचे चौफटका पार। …… तो मेरे गुरु, मेरे दोस्त, मेरे पात्र, मेरे साथी, मेरे लेखक, मेरे अड्डे,  मेरे फुटपाथ, यहां तक कि मेरी प्रेमिका और फिर मेरी पत्नी सभी इसी शहर के पात्र हैं। मैं उन्हें नागरिक नहीं पात्र कहता हूँ क्योंकि उन्हीं से मेरी रचना पैदा हुई है। जिस सभागार में हम उपस्थित हैं उससे कुछ दूरी पर पोनप्पा रोड़ है। जहाँ हुड्ड हो जाने के बाद मैंने सायकिल सीखी और इनाम में सौ रुपए पाए क्योंकि मेरे लोग यह उम्मीद छोड़ चुके थे। साउथ रोड की मरीन ड्राइव की तरह लहराती कटावदार बत्तियां दूधनाथ की कहानी में हैं ,ज़ीरो रोड को नासिरा शर्मा ने आबाद किया और भगवती बाबू के उपन्यास में रास्ते राहत जगाती  यूनिवर्सिटी रोड बार बार आता है और वो शानदार गोल केथेड्रल जिसने धर्मवीर भारती को प्रेरित किया और वे अंधायुग तक गए। इसी इलाके में महादेवी  सबसे पास थीं पर वे सदा सबसे दूर रहीं। यहाँ से अमृत राय भी पास थे और श्रीपत राय  सानु सन्यासी ड्रूमंड रोड पर। बहुत बाद में इसी इलाके में अमरकांत भी आए ,मार्कण्डेय ,ओंकार शरद राजापुर  सिमेट्री के पास बसे  थे। आकाशवाणी के दो जुड़वां  बंगले भी इस सभागार के पास हैं  जहाँ एक समय गिरिजा कुमार माथुर कभी कभार एक टाँगे पर दारागंज तक जाते थे। तांगा रस्तोगी जी का था। उनके साथ इस आवारा को दो चार बार संगत करने का अवसर मिला। यहीं भारत भूषण अग्रवाल और प्रभाकर माचवे भी थे जिन्होंने मुझे तीन सप्ताह के तीन अनुबंध दिए थे जिसकी मज़दूरी  उन दिनों कुल पंद्रह रुपये थी। यहीं स्टूडियो में मैंने उस्ताद अलाउद्दीनखां के सरोद को खिलखिलाते और सरोद पर उस्ताद को आंसू टपकाते भी देखा था। यहीं मैंने पहली बार  प्रभात के साथ मुक्तिबोध की गौरांगउटान कविता का पाठ भी सुना। उन दिनों इलाहाबाद का ये इलाका दबंग, अभिजात्य अंग्रेजी शिल्प और सुनसान से भरा ऐसा इलाका था जहाँ कोई बूढ़ी औरत सीताफल नहीं बेच सकती थी। और मूंगफली के ठेले भी इधर नहीं घुसते थे। यह थी पच्छिम की थॉर्नहिल रोड।
          नगरों की एक आयु होती है, वे कितने ही गर्वीले और शरीफ क्यों न हों। ध्यानस्थ हो सौ वर्ष पहले और सौ वर्ष बाद के इलाहाबाद के दृश्य देखे जा सकते हैं। क्योंकि हमारे देश में विकास का जो दर्शन उभरा है और जिस पर एक सीमा तक सहमति भी हो गयी है उसी में ध्वंस, डूब और विनाश निहित हो गया है।जो नगर जल प्लावन, युद्ध, भूकम्प, आवागमन, निष्क्रमण तथा प्रजनन और विकास के अनन्य बहानों की वजह से जमींदोज़ हुए उनमें   सात आठ सौ सालों में गणना सौ के पार हो जाएगी। इनमें जीवित मरे हुए भी शामिल हैं। हमारे देखते देखते विकास ने टिहरी और हरसूद को निगल लिया।  अभी पचास सालों में और नगर तबाह  होने की प्रतीक्षा में हैं। ये शहर नहीं सभ्यताएं थीं। मैं इलाहाबाद के घमंड को टूटते हुए देख रहा हूँ। इसके गर्वीले चिन्ह और लैंडमार्क मिट रहे हैं। लेकिन सुन्दर और मरी हुई चीज़ें भी  शानदार हो सकती हैं। नालंदा, तक्षशिला, मोहनजोदड़ों,कौशाम्बी, एथेंस  की याद कर लें। सूची और भी है। इलाहाबाद वयोवृद्ध है या उन्मत्त   या हत्यारों द्वारा मारा जाएगा या क्या पता नदियां इसे घेर लेंगी। मेरी यह समझ है इलाहाबाद पर हमला हो चुका है। ये हमले पुणे, हैदराबाद, बेंगलुरु, लखनऊ,  दिल्ली और अहमदाबाद पर भी हो चुके हैं।  एक अदृश्य दीवार खड़ी हो गयी है जो नए पुराने शहरों के बीच है। हमारे जैसे लोग नए पुराने किसी भी हिस्से में चैन से नहीं रह सकते। इस आर्थिक और सांस्कृतिक बलवे का अंजाम कहाँ तक जाएगा यह सब जानना पहचानना हमारे लिए दिलचस्प है। सवाल मरने जीने का नहीं है। सवाल इसके आगे का है। शहर में सामग्रियाँ,तरल मुद्रा,चमक दमक,भुलक्कड़ी,जन संकुलता किसी की भी कोई कमी नहीं है।फिर भी सवाल खतरनाक होते जा रहे हैं।  इस सम्मान कार्यक्रम में मैं संकेत देना चाहता हूँ कि इलाहाबाद पर एक किताब चल रही है। यह वक्तव्य केवल कृतज्ञता मात्र है। इलाहाबाद  के कारण मुझे आज भी बोनस मिल रहा है।" 





हवा बदल गई है



हवा बदल गई है 
अब हवाएँ ज़हरीली हो गई हैं 
धुआं हवाओं को धमकाता है 
फ़िज़ाओं में ज़हर मत घोलों 
हवाएँ स्तब्ध हैं 
निस्पंद हैं 
जिससे एक निर्वात पैदा हो गया है 
और उसमें सब ऊपर नीचे हो रहे हैं 
बिना पेंदी के।  




Monday, 25 August 2014

भस्मासुर




वो जो सबसे शक्तिशाली है
मन के किसी कोने में सबसे बुझदिल है
उसे सताता है डर 
हर पल
अपने जैसे ही किसी दूसरे के अपने मुक़ाबिल खड़े होने का
डरता है हर किसी से
ना जाने कौन सा निहत्था उसे कर दे निरुत्तर
ना जाने कौन सा बच्चा खड़ा हो जाए उसके ख़िलाफ़ लेकर हथियार
ना जाने कौन सा किसान छीन ले  उसकी मुँह का निवाला
ना जाने कौन सा नागरिक छीन ले उसकी आज़ादी
ना जाने कौन सा शासक छीन ले उसकी सत्ता
गिराता है परमाणु बम
चलाता है  ड्रोन से मिसाइलें
जलाता है तेल के कुँए
रोकना चाहता है आत्महत्या करते किसानों की सब्सिडी
करता है हवाई हमले  मातृभूमि की मांग करते बच्चों और औरतों पर
बंद कर देना चाहता है अभिव्यक्ति  के सारे साधन
चाहता है हर किसी को रौंदना
चाहता है कुचलना
कर देना चाहता है नेस्तनाबूद
मिटा देना चाहता है अस्तित्व
पर वो नहीं जानता 
भस्मासुर भी नहीं बचा था 
एक दिन 
अपनी शक्ति के मद में चूर
वो भी उसी की तरह नाचेगा
अपने सर हाथ रखकर 
और खुद ही भस्म हो जाएगा।





Friday, 6 June 2014

क्षणिका



ज़िन्दगी में कुछ लम्हें ऐसे आते हैं
जो गुज़र कर भी
गुज़रते नहीं
बल्कि जिन्दगी के साथ
हमेशा के चस्पाँ हो जाते हैं !





Wednesday, 4 June 2014

सच



तुमने प्यार में खुद को 
धरती बना डाला
पर
मैं
खुद को
बादल ना बना पाया
तुम समझी
मैं बरस कर
तुम्हारे मन को प्रेम रस में पगाना नहीं चाहता 
 पर
ये सच नहीं था
सच ये था
 मैं
तुम्हारे अंदर की आग को
बुझते नहीं देख सकता था।


तुमने प्यार में खुद को
नदी बना दिया
पर
मैं
समन्दर  ना बन सका
तुम समझी
मैं
प्रेम का प्रतिदान ना कर सका
पर
ये सच नहीं था
सच ये था
मैं
तुम्हारे वज़ूद को
खत्म होते नहीं देख सकता था।




Tuesday, 8 April 2014

औरत

 औरत : एक   

शहर के पॉश इलाके में साईं बाबा का एक मंदिर है
कहते हैं सरकारी जमीन पर अतिक्रमण कर बनाया गया है
इसके निर्माण में न्याय से लेकर प्रशासन तक सभी ने 
यथा सम्भव योगदान किया है
अब ये हिट है। 

मंदिर में खूब भीड़ भाड़ होती है,
रोज़ भक्तों का बाबा से मिलन होता है,
बाहर भण्डारे चलते हैं,
अंदर चढ़ावे चढ़ते हैं,
और बेशकीमती कपड़ों से बाबा का श्रृंगार होता है। 

पर भक्तों की उस भीड़ में घूमती अधेड़ सी एक औरत है
बेखबर बेपरवाह इस सभी से,
भूख से बिलबिलाती,
झूठे पत्तलों को चाटती,
गर्मी में कुम्हलाती,
और सर्दी में किटकिटाती,
बिना किसी के आगे हाथ फैलाए,
बिना कुछ माँगे,
अनावृत यौनांगों को लिए हुए
वो संवेदनहीन सी।

वो निपट अकेली है क्योंकि वह 
बाज़ार के लिए घाटे का सौदा है
वर्ग संघर्ष के लिए भोथरा हथियार है
आस्तिकों के लिए कर्मों का फल है
नास्तिकों के लिए पाप का निशानी है 
समाज के लिए बोझ है 
शासन के लिए ज़िंदा लाश है 
तो क्या वो .... 
ना ना.…आप गलत सोच रहे हैं 
वो पागल कतई नहीं है 
मैं बताता हूँ 
दरअसल ये वो आईना 
जिसमें हमारा अक्स साफ़ साफ़ दिखाई देता है 
हम में बढ़ती जाती अजनबियत का 
दुगुनी होती संवेदनहीनता
पल पल मरते जाते ज़मीर का



औरत :दो 

शहर के दूसरे पॉश इलाके का ये मंदिर
सरकारी ज़मीन पर खड़ा 
हिस्ट्री शीटर पुजारी बना
गणेश जी ने दूध पिया
तो एक से दो बना
घूमती पगली सी इधर उधर एक नवयौवना का
इसी की छाया में आशियाना बना। 

कभी रेंगे थे आदमी इस शरीर पर
लिजलिजे कीड़ों की तरह
और छोड़ दिया था निर्जीव से शरीर को कबाड़ की तरह
आज वो आड़ कबाड़ को  खींचती है
फिर लाद लेती है अपने ऊपर उसे 
आदमी समझ कर
जैसे लादती आयीं हैं जन्म जन्मान्तर से। 
लेकिन अब एक अंतर आ गया है 
लादने के बाद 
वह उसे पीटती है,घसीटती है, फ़ेंक देती है 
और बार-बार यही प्रक्रिया दोहराती है,
मानो उन्हें दिखा रही हो उनका अक्स
कि तुम सिर्फ और सिर्फ़ कबाड हो
भले ही समाज और चिकित्सा विज्ञान उसे पागल कहे 
वह अब सभी बंधनों से आज़ाद है 
और वही करती है जो सही समझती है। 



औरत :तीन 

शहर के तीसरे पॉश इलाके का ये शानदार अपार्टमेंट
कब्जाई जमीन पर बना है
और  काली कमाई से खरीदे गए फ्लैट में
काम करती एक बाई है
जिसने अपने पेट की आग बुझाने के लिए
नशेड़ी पति की दारु के लिए
और बच्चों के दूध के लिए

बेच दिया
बच्चों के हिस्से का बेशकीमती समय
छोड़ दिया अपने हिस्से में आने वाला बच्चों का दुलार 

अब छूट गया 
बच्चों को बड़े होते देखने का सुख,
उनको दुलारने सहलाने की हूक,
उनको कुछ सिखाने की तमन्ना,
जवान होती बेटियों से राज़ बांटने की इच्छा,
खुद के सजने संवरने की चाह।  

खो गया  
मन का चैन,
और तन का सुख। 

टूट गए 
मन में सजाए सारे सपने,
और उन सपनों के सच होने की उम्मीद। 

अब वह शानदार मॉड्यूलर किचेन में खड़ी हो ढूंढती है
अपने हिस्से का सुख,
हटाती है उम्मीद के जूने से दुःख की झूठन,
जिंदगी के कमरों को झाड़ पोंछ कर
करती है जतन
किस्मत पर पडी धूल को हटाने का,
छींटती पछोटती है जिंदगी के कपड़ों को
और टाँग देती है क्लिप के सहारे रस्सी पर,
फिर देखती है आसमान की ओर इस आस में
कभी तो वो सुबह होगी
जिसकी धूप 
चुपके से सोख लेगी 
उसकी जिंदगी के अभावों के गीलेपन को
और उसकी जिंदगी में भी रह जाएंगे
निरे सुख। 





 



Saturday, 5 April 2014

सड़क




सड़क जिंदगी के समानांतर चलती है
अपने इतने करीब लगती है
जीवन की कहानी बयाँ करती सी लगती है
क्या कभी आपने सड़क को ध्यान से देखा है ?

जी हाँ
सड़क
सुबह सुबह
शांत,निर्मल, पवित्र सी
दूर क्षितिज तक जाती
जिसका कोई अंत नहीं
छोटे से बच्चे की तरह मासूम सी दिखती
अनंत सम्भावनाओं को समेटे
खाली स्लेट सी साफ़ सुथरी
जिस में कुछ भी रच बस सकता है
और पूरा शहर उसके आगोश में समा सकता है। 

सड़क
दोपहर होते होते पूरे जोश से भर जाती है
पूरी क्षमता भर लोगो को ढ़ोती है
और भाग रही होती है
यहाँ से वहाँ
फुर्सत नहीं होती सांस लेने की भी
अपने में मगन
मग़रूर नौजवाँ सी सड़क।

सड़क
साँझ ढलते ही लगने लगती है
थकी-थकी सी
रफ़्तार पड़ने लगती है मद्विम
रौनक भी होने लगती है कम
लोग लगते है साथ छोड़ने।

और
रात बढ़ने के साथ ही
बुढ़ापे की तरह
एकाकी होने लगती है सड़क
एक-एक करके सभी छोड़ जाते हैं साथ
रह जाती है निपट अकेली वो
अन्धकार कुछ इस तरह से लेता है जकड़
कि पैरों के पास ही ख़त्म होती लगती है दुनिया 
उसके आगे सिर्फ रह जाता है अन्धेरा ही अँधेरा 
अकेले जीने को अभिशप्त
कभी कभार इक्के दुक्के भूले भटके आए राहगीर के साथ चलकर कुछ दूर
नई सुबह की इंतज़ार में
अकेले रात काटती सड़क।

कितनी अपनी कहानी सी लगती है सड़क। 







Wednesday, 29 January 2014

सपने

1. 
सपने काँच की रंग बिरंगी चूड़ियों से नाज़ुक 
अभावों की हल्की सी ठसक से 
किरिच किरिच 
टुकड़ों टुकड़ों में 
बिखर बिखर जाते। 


2. 
सपने मन के आसमान में 
रंग बिरंगी पतंगों से
बिंदास बिंदास से 
ऊँचे ऊँचे उड़ते जाते 
ग़म के हलके से झोंके से 
फटे फटे से काग़ज की तरह 
ज़मीन पर पड़े पड़े 
नज़र आते।  


3. 
सपने  रंग बिरंगे गुब्बारो जैसे 
आशाओं की हवाओं से 
बड़े बड़े हो आसमान की ओर जाते 
रंज़ की हल्की सी नोक से 
बिंध बिंध कर 
ज़मीन पर बिखर बिखर जाते। 


4. 
सपने दुःख के बादलों से 
काले काले होते जाते 
उनके छंटते ही 
आशाओं की बूँदो के पार 
इंद्रधनुष बनाते। 








Tuesday, 31 December 2013

उम्मीद के गीत





1. 

आशा भरी सुबहें 
विश्वास से लिपटी शामें 
मस्ती भरे दिन 
चैन से कटती रातें 


2. 

उम्मीदों की नदी 
दुखों के पहाड़ का सीना चीर कर 
सुखों के मैदानों को सींचती 
जा मिलेगी  
आनंद के असीम सागर में !

3. 

यूँ ही नहीं कहा शैली ने 
कि सर्द हवाओं के बाद 
बहेगी बासंती बयार 
इसलिए मेरे दोस्त
मत होना निराश . 

दुखों के काले बादल  
तो बरस कर चले जाएंगे 
और रह जाएगी सिर्फ सुख की रोशनी 

मत घबराना 
निराशाओं की स्याह रात से   
आशाओं का सवेरा सोख लेगा इस स्याही को   
और रह जायेगी उम्मीदों की सुर्ख सफ़ेद चादर 

मत घबराना अपने भीतर की कायरता से
तुम्हारे हौसलों की ऊष्मा 
जलाकर  कर देगी राख़
सारी कायरता को 
और निर्मित कर देगी तुम्हारे भीतर एक ऐसा संसार  
जहाँ होंगे
बिंदास ठहाके 
खनखनाती हसीं  
मंद मंद मुस्कान 
उम्मीद ही उम्मीद 
आशा का सागर 
रोशनी का सूरज

और कहीं दूर खड़े दुःख  
उस पर कर रहे होंगे रश्क़ !





4.

क्या दूँ दोस्त तुम्हें
इस नए साल के मुबारक मौके पर

थोड़ी सी धूप कड़कड़ाती सर्दी के लिए
थोड़ी सी छाँव चिलचिलाती गर्मी के लिए
थोड़ी सी छत घनघोर बारिश के लिए
थोड़ी सी बूंदे तपते रेगिस्तान के लिए
थोड़ी सी नींद बेचैन रातों के लिए
थोड़ी सी फुर्सत दौड़ते भागते दिन के लिए
थोड़ी सी आस निराश जिंदगी के लिए
थोड़ी सी हँसी उदास लम्हों के लिए
थोड़ी सी खुशी ग़मों के सागर के लिए
थोड़ा सा प्यार नफरतों की बारिश के लिए
थोडा सा साहस अन्याय से लड़ने को 
थोड़ी सी रोशनी घोर अंधेरे के लिए 

ये 'थोड़ा थोड़ा' सा ही 'बहुत सा' वाले समय में 
ये थोड़ा तुम्हारे पास रहे 
ये थोड़ा मेरे पास रहे 
बस इस थोड़े से ही अच्छे से उम्र कटे।  



Thursday, 7 November 2013

प्रेम



आओ साथी आओ
डाले हाथ में हाथ
चले साथ
और प्रेम के विरोधियो को
सिखाएं प्रेम का पाठ


आओ चलें चाँद पर
समेट कर वहाँ से लाएँ
ढेर सारी शीतलता
और उससे कर दें शांत
प्रेम विरोधियों की सारी घृणा


 आओ चले सूरज के पास
 माँग कर वहाँ से लाएँ
 ढेर सारी ऊष्मा
 और भर दे
 प्रेम विरोधियों में प्रेम की गर्मी


आओ चले बृहस्पति के पास
बटोर कर वहाँ से लाएँ
ज्ञान का भण्डार
और सिखा दे
प्रेम विरोधियों को प्रेम के मायने

आओ चलें शुक्र के पास
उतार ले आएं वहाँ से
प्यार की गंगा
और तर्पण कर दे
प्रेम विरोधियों के सारे पूर्वाग्रह और कुंठाएं


आओ चले शनि के पास
सीख कर आएं वहाँ से
थोड़ा सा जादू
और दूर कर दे
प्रेम विरोधियों के मन की सारी कलुषता


आओ चलें तारों के पास
भर कर लाएं वहाँ से
रोशनी की झोली
और उतार दे उसको
प्रेम विरोधियों के दिमाग में
(ताकि देख सकें प्रेम को साफ़ साफ़ )


आओ सिखा दे
प्रेम विरोधियों को
स्वयं सैनिकों को
धर्म विद्यार्थियों को
खाप पंचायतों को
प्रेम करना


और बता दे उन्हें
कि वे भी तो किसी के प्यार की उपज हैं।







Sunday, 27 October 2013

मैंने शिव को देखा है


मैंने शिव को देखा है 

गली, चौराहों, सड़को और घरों में 

यहाँ तक कि लोगों की जेबों में देखा है। 

कभी सर्जक 

तो कभी विध्वंसक होते देखा है।

कभी जमींदारों का  हथियार 

और पूंजीपतियों का कारखाना होते देखा है 

तो कभी  मजदूरों की बंदूक होते देखा है।  

कभी सभ्यताओं को  विकसित करते 

और आज उन्हें विनाश के मुहाने खडा करते देखा है  

मैंने आदमी को देखा है।